Homeलाइफस्टाइलचैत्र नवरात्रि: उज्जैन की रक्षा करती हैं हरसिद्धि माता, सम्राट विक्रमादित्य ने...

चैत्र नवरात्रि: उज्जैन की रक्षा करती हैं हरसिद्धि माता, सम्राट विक्रमादित्य ने 11 बार दी थी अपने सिर की बलि

और पढ़ें

Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 13 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Harsiddhi Mata Mandir Ujjain:  वैसे तो भारत में देवी हरसिद्धि के कई मंदिर हैं, लेकिन वाराणसी, उज्जैन और तरावली (भोपाल) में स्थित हरसिद्धि मंदिर का विशेष पौराणिक महत्व है।

उज्जैन में स्थित हरसिद्धि माता मंदिर, 51 शक्तिपीठों में से एक है, यहां देवी सती की कोहनी गिरी थी।

माता हरसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी मानी जाती हैं।

जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि मां हरसिद्धि हर काम सिद्ध करती है।

इसी वजह से देश भर के श्रद्धालु नवरात्रि के दौरान यहां पर माता का आशीवार्द लेने आते हैं।

हरसिद्धि मंदिर में माता के तीन रूपों की पूजा होती है. यहां पर माता कालिका, माता अन्नपूर्णा और हरसिद्धि विराजित हैं.

इसके अलावा जिनकी मनोकामनाएं पूरी होती है वह यहां के प्राचीन दीप स्तंभों पर दीप भी प्रज्वलित करवाते हैं।

Maa Harsiddhi, Ujjain, Harsiddhi Mata mandir, 51 Shaktipeeth, mata Sati, raja Vikramaditya
Harsiddhi Mata Mandir Ujjain

हरसिद्धि माता मंदिर के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें

  • 51 शक्तिपीठों में से एक: यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरने की मान्यता है
  • यह मंदिर भैरव पर्वत पर शिप्रा नदी के राम घाट के पास स्थित है
  • कोहनी गिरने की मान्यता: मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी
  • दीप स्तंभ: मंदिर प्रांगण में दो बड़े दीप स्तंभ हैं, जिन पर नवरात्रि के दौरान 5 दिन तक दीप मालाएं लगाई जाती हैं
  • आरती: मंदिर में शाम को संध्या आरती होती है, जो देखने लायक होती है
  • महाकालेश्वर मंदिर के पास: यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर से 2 मिनट की पैदल दूरी पर स्थित है
  • तांत्रिक महत्व: मंदिर का तांत्रिक महत्व भी है और यहां श्रीसूक्त और वेदोक्त मंत्रों के साथ पूजा होती है
Maa Harsiddhi, Ujjain, Harsiddhi Mata mandir, 51 Shaktipeeth, mata Sati, raja Vikramaditya
Harsiddhi Mata Mandir Ujjain

सम्राट विक्रमादित्य ने 11 बार चढ़ाया था शीश

किंवदंती है कि सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे और उन्होंने 11 बार अपना सिर माता को अर्पित किया था। जानते हैं इसकी पूरी कथा…

मान्यता है कि दो हजार वर्ष पूर्व काशी नरेश गुजरात की पावागढ़ माता के दर्शन करने गए थे।

वे अपने साथ मां दुर्गा की एक मूर्ति लेकर आए और मूर्ति की स्थापना की और सेवा करने लगे।

उनकी सेवा से प्रसन्न होकर देवी मां काशी नरेश को प्रतिदिन सवा मन सोना देती थीं।

जिसे वो जनता में बांट दिया करते थे। यह बात उज्जैन तक फैली तो वहां की जनता काशी के लिए पलायन करने लगी।

उस समय उज्जैन के राजा विक्रमादित्य थे। जनता के पलायन से चिंतित विक्रमादित्य काशी पहुंचे।

वहां उन्होंने बेताल की मदद से काशी नरेश को गहरी निद्रा में लीन कर स्वयं मां की पूजा करने लगे।

तब माता ने प्रसन्न होकर उन्हें भी सवा मन सोना दिया। विक्रमादित्य ने वह सोना काशी नरेश को लौटाने की पेशकश की।

लेकिन काशी नरेश ने विक्रमादित्य को पहचान लिया और कहा कि तुम क्या चाहते हो।

तब विक्रमादित्य ने मां को अपने साथ ले जाने का अनुरोध किया। काशी नरेश के न मानने पर विक्रमादित्य ने 12 वर्ष तक वहीं रहकर तपस्या की।

Maa Harsiddhi, Ujjain, Harsiddhi Mata mandir, 51 Shaktipeeth, mata Sati, raja Vikramaditya
Harsiddhi Mata Mandir Ujjain

मां के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वरदान मांगे, पहला वह अस्त्र, जिससे मृत व्यक्ति फिर से जीवित हो जाए और दूसरा अपने साथ उज्जैन चलने का।

तब माता ने कहा कि वे साथ चलेंगी, लेकिन जहां तारे छिप जाएंगे, वहीं रुक जाएंगी।

लेकिन उज्जैन पहुंचने सेे पहले तारे अस्त हो गए। इस तरह जहां पर तारे अस्त हुए मां वहीं पर ठहर गईं। इस तरह वह स्थान तरावली (भोपाल) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

तब विक्रमादित्य ने दोबारा 12 वर्ष तक कड़ी तपस्या की और आपने सिर की बलि मां को चढ़ा दी, लेकिन मां ने विक्रमादित्य को जीवित कर दिया।

यही क्रम 11 बार चला और राजा विक्रमादित्य अपनी जिद पर अड़े रहे।

ऐसे में मां ने अपना सिर विक्रमादित्य को दे दिया और कहा कि इसे उज्जैन में स्थापित करो।

तभी से मां के तीनों अंश यानी चरण काशी में अन्नपूर्णा के रूप में, धड़ तरावली (भोपाल) में और सिर उज्जैन में हरसिद्धी माता के रूप में पूजे जाते हैं।

Maa Harsiddhi, Ujjain, Harsiddhi Mata mandir, 51 Shaktipeeth, mata Sati, raja Vikramaditya
Harsiddhi Mata Mandir Ujjain

उज्जैन की रक्षा करती हैं देवी हरसिद्धि

उज्जैन में दो शक्तिपीठ माने जाते हैं। पहला हरसिद्धि माता और दूसरा गढ़कालिका माता का शक्तिपीठ।

एक धार्मिक मान्यता यह भी है कि उज्जैन की रक्षा के लिए आसपास कई देवियां है, उनमें से एक देवी हरसिद्धि भी है।

हरसिद्धि मंदिर में है चार प्रवेशद्वार

उज्जैन स्थित देवी हरसिद्धि मंदिर में 4 प्रवेशद्वार हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की तरफ है।

मंदिर के दक्षिण-पूर्व के कोण में एक बावड़ी बनी हुई है, जिसके अंदर एक स्तंभ है।

यहां श्री यंत्र बना हुआ स्थान है।

मां सती की कोहनी गिरी थी

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने देवी सती के जले हुए शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव किया, तो उनके शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ बन गए।

उज्जैन में देवी सती की कोहनी गिरी थी, और यहां माँ हरसिद्धि प्रकट हुईं।

Maa Harsiddhi, Ujjain, Harsiddhi Mata mandir, 51 Shaktipeeth, mata Sati, raja Vikramaditya
Harsiddhi Mata Mandir Ujjain

चमत्कारिक विशेषताएं

1. दीप स्तंभ का रहस्य: मंदिर में दो विशाल दीप स्तंभ हैं, जिन पर सैकड़ों दीये जलते हैं। कहा जाता है कि इन दीयों को जलाने से विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

2. चमत्कारी शक्तियां: भक्तों का मानना है कि यहां सच्चे दिल से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है।

3. रक्त सिंदूर तिलक: यहां मां को रक्त के रंग जैसा सिंदूर चढ़ाया जाता है, जिसे उनके देवी स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

4. लोक कथाओं के मुताबिक माना जाता है कि मंदिर में जो सिंदूर चढ़े सिर रखे है वो राजा विक्रमादित्य के हैं।

बेहद खास है मंदिर के दो दीप स्तंभ

  • यूं तो इस मंदिर की और भी कई विशेषताएं हैं, लेकिन एक खास बात जो लोगों के आकर्षण का केंद्र है, वो है मंदिर प्रांगण में स्थापित 2 दीप स्तंभ।
  • ये दीप स्तंभ लगभग 51 फीट ऊंचे हैं। दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं।
  • मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी।
  • विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार साल पुराना है। ऐसे में ये दीप स्तंभ भी 2 हजार साल से अधिक पुराने हैं।
  • दीप स्तंभों पर चढ़कर हजारों दीपकों को जलाना सहज नहीं है, लेकिन उज्जैन निवासी जोशी परिवार लगभग 100 साल से इन दीप स्तंभों को रोशन कर रहा है।
  • दोनों दीप स्तंभों को एक बार जलाने में लगभग 4 किलो रूई की बाती व 60 लीटर तेल लगता है।
  • समय-समय पर इन दीप स्तंभों की साफ-सफाई भी की जाती है
  • हरसिद्धि मंदिर के ये दीप स्तंभ श्रृद्धालुओं के सहयोग से जलाए जाते हैं।
  • इसके लिए हरसिद्धि मंदिर प्रबंध समिति में पहले बुकिंग कराई जाती है।
  • प्रमुख त्योहारों जैसे- शिवरात्रि, चैत्र व शारदीय नवरात्रि, धनतेरस व दीपावली पर दीप स्तंभ जलाने की बुकिंग तो साल भर पहले ही श्रृद्धालुओं द्वारा करवा दी जाती है।
  • कई बार श्रृद्धालु की बारी आते-आते महीनों लग जाते हैं।
  • पहले के समय में चैत्र व शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि तथा प्रमुख त्योहारों पर ही दीप स्तंभ जलाए जाते थे, लेकिन अब रोज दीप स्तंभ जलाए जाते हैं।
  • जिनकी मनोकामनाएं पूरी होती है वह भी यहां पर दीप प्रज्वलित करवाते हैं।
  • हरसिद्धि मंदिर में कई वर्षों तक के लिए दीप मलिका प्रज्वलित करने की बुकिंग हो चुकी है।
Maa Harsiddhi, Ujjain, Harsiddhi Mata mandir, 51 Shaktipeeth, mata Sati, raja Vikramaditya
Harsiddhi Mata Mandir Ujjain

हरसिद्धि नाम की कहानी

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंड और मुंड नामक दो दैत्यों ने एक बार कैलाश पर कब्जा करने की योजना बनाई।

चंड और मुंड ने अंदर घुसने की कोशिश की लेकिन द्वार पर ही शिव के नंदीगण ने उन्हें रोक दिया। तब दोनों दैत्यों ने नंदीगण को शस्त्र से घायल कर दिया।

जब भगवान शिव को इसका पता चला तो उन्होंने चंडी देवी का स्मरण किया।

शिव की आज्ञा से देवी ने दोनों दैत्यों का वध कर दिया।

इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि आपने दुष्टों का वध किया है इसलिए आप हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध होंगी।

कैसे पहुंचे हरसिद्धि मंदिर उज्जैन

  • उज्जैन मध्य प्रदेश का एक प्रमुख शहर है इसलिए यहां पहुंचने के लिए बस, रेल व वायु सेवा उपलब्ध है।
  • वायु सेवा करीब 57 किलोमीटर दूर स्थित इंदौर और राजधानी भोपाल तक उपलब्ध है।
  • मंदिर से रेल्वे स्टेशन व बस स्टैंड की दूरी करीब 1 किलोमीटर है।
- Advertisement -spot_img