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कोर्ट को ‘सुप्रीम’ कहलाने का हक नहीं: मौलाना मदनी का बड़ा बयान, हलाला और जिहाद पर भी बोले

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 13 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Maulana Mahmood Madani भोपाल में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की राष्ट्रीय गवर्निंग काउंसिल की बैठक में संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों पर सवाल उठाए हैं।

मौलाना मदनी ने अपने भाषण में ये आरोप लगाया कि अदालतें सरकार के दबाव में काम कर रही हैं।

उन्होंने बाबरी मस्जिद मामले में फैसले और तलाक़-ए-बिद्दत (तीन तलाक) के मुद्दे को उदाहरण के तौर पर पेश किया।

उनके इन बयानों ने राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है।

सुप्रीम कोर्ट पर सीधा हमला: ‘सुप्रीम कहलाने का हक नहीं’

मदनी ने विशेष रूप से ज्ञानवापी और मथुरा मामलों में अदालतों द्वारा ‘पूजा स्थल कानून’ (इबादतगाह ऐक्ट) की अनदेखी किए जाने पर चिंता जताई।

उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट तभी ‘सुप्रीम’ कहलाने का हकदार है जब वह संविधान का पालन करे। अगर वह ऐसा नहीं करती, तो उसे सुप्रीम कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।”

‘जुल्म के खिलाफ संघर्ष का नाम है जिहाद’

मौलाना मदनी के भाषण का दूसरा मुख्य मुद्दा ‘जिहाद’ शब्द को लेकर था।

उन्होंने कहा कि इस्लाम के विरोधियों ने जानबूझकर ‘जिहाद’ जैसे पवित्र शब्द को हिंसा और आतंक का पर्याय बना दिया है।

उन्होंने ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर गहरी नाराजगी जताई और कहा कि इससे मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचती है।

उन्होंने स्पष्ट किया, “इस्लाम में जिहाद एक पवित्र अवधारणा है। इसका मतलब सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि अपने अंदर की बुराइयों से लड़ना, समाज में अच्छाई को बढ़ावा देना और जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना भी है।”

उन्होंने जोर देकर कहा, “मैं दोहराता हूँ, जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। जहां-जहां उत्पीड़न होगा, वहां-वहां जिहाद होगा।”

उन्होंने यह भी साफ किया कि जिहाद का मतलब बदला नहीं है और लोकतंत्र में इसकी अवधारणा अलग है।

हलाला को बदनाम किया जा रहा है

मौलाना ने आगे कहा- हमारे धार्मिक रीति-रिवाजों, खासकर हलाल को बदनाम किया जा रहा है। जबकि हलाल का मतलब सिर्फ़ रस्मी ज़ब्त करना नहीं है; यह एक मुसलमान के जीवन जीने के पूरे नैतिक तरीके को दिखाता है। इसमें कानूनी कमाई, नौकरी और व्यापार में ईमानदारी, भरोसेमंद होना और पैसे का सही इस्तेमाल शामिल है। यह एक नैतिक सिस्टम है जो किसी व्यक्ति को ज़ुल्म, धोखे, रिश्वत और गैर-कानूनी कमाई से बचाता है…”

वंदे मातरम विवाद पर क्या बोले

वंदे मातरम के मुद्दे पर मदनी ने कहा, “मुर्दा कौमें सरेंडर करती हैं। अगर कहा जाएगा ‘वंदे मातरम’ बोलो, तो वे बोलना शुरू कर देंगी। जिंदा कौम हालात का मुकाबला करती है।”

इस बयान का मतलब यह समझा गया कि मुसलमानों को दबाव में आकर वंदे मातरम नहीं बोलना चाहिए, बल्कि अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए।

मुस्लिम संगठनों में मतभेद

इस बयान पर अन्य मुस्लिम संगठनों ने दूरी बना ली है।

जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष मौलाना सादातुल्लाह हुसैनी ने कहा कि इस तरह के विवाद गैर-जरूरी हैं।

उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को अपने तरीके से देशभक्ति व्यक्त करने का अधिकार है और किसी एक नारे को थोपना सही नहीं है।

मंत्री विश्वास बोले- यह संवैधानिक व्यवस्था का अपमान

राज्य के सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास सारंग ने मौलाना मदनी के वंदे मातरम संबंधी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा—“हिंदुस्तान की हवा-पानी में जीकर अगर कोई वंदे मातरम पर सवाल उठाता है, तो यह संवैधानिक व्यवस्था का अपमान है। खाते हिंदुस्तान की हैं और गाते किसी और की— यह अब नहीं चलेगा।”

उन्होंने कहा कि संविधान और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं पर टिप्पणी करना बेहद गंभीर मामला है।

संबित पात्रा ने कहा भड़काऊ भाषण

BJP MP और नेशनल स्पोक्सपर्सन संबित पात्रा ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “जिस तरह से जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद के चीफ मौलाना महमूद मदनी ने भोपाल में कहा कि जहां भी किसी तरह का दबाव हो, वहां ‘जिहाद’ छेड़ना चाहिए, वह न सिर्फ भड़काने वाला है बल्कि बांटने वाला भी है।”

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