Portable 3D X-Ray Device: भारत में अक्सर कहा जाता है कि ‘गोल्डन आवर’ (हादसे के ठीक बाद का एक घंटा) में अगर सही इलाज मिल जाए, तो मरीज की जान बच सकती है।
लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामीण इलाकों या हाईवे पर हुए हादसों में मरीज को सीटी स्कैन या एडवांस डायग्नोसिस के लिए बड़े शहरों तक ले जाना पड़ता है।
इस दूरी और समय के बीच कई जिंदगियां दम तोड़ देती हैं।
इसी गंभीर समस्या को खत्म करने के लिए AIIMS भोपाल और IIT इंदौर ने हाथ मिलाया है।
ये दोनों संस्थान मिलकर दुनिया की पहली AI-आधारित पोर्टेबल 3D एक्स-रे यूनिट विकसित कर रहे हैं।

ICMR का बड़ा भरोसा और फंडिंग
इस प्रोजेक्ट की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशभर से भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) को प्राप्त 1224 रिसर्च प्रस्तावों में से केवल 38 को चुना गया।
मध्यप्रदेश से यह एकमात्र प्रोजेक्ट है जिसे मंजूरी मिली है।
ICMR ने इस तकनीक को हकीकत में बदलने के लिए 8 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया है।
तकनीक जो सीटी स्कैन को देगी टक्कर
वर्तमान में सीटी स्कैन मशीनें बहुत भारी, महंगी और उच्च रेडिएशन वाली होती हैं।
AIIMS और IIT की यह नई डिवाइस पोर्टेबल होगी, जिसे आसानी से एंबुलेंस में रखा जा सकेगा।
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AI का जादू: यह मशीन एक्स-रे तकनीक का उपयोग करेगी, लेकिन इसमें लगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और एडवांस्ड एल्गोरिद्म अलग-अलग एंगल से ली गई तस्वीरों को प्रोसेस करके 3D इमेज में बदल देगा।
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कम रेडिएशन: सबसे खास बात यह है कि इसमें सीटी स्कैन की तुलना में 500 गुना कम रेडिएशन होगा, जो मरीज की सेहत के लिए बहुत सुरक्षित है।
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तत्काल रिपोर्ट: जांच की रिपोर्ट मोबाइल या छोटी स्क्रीन पर तुरंत देखी जा सकेगी, जिससे डॉक्टर मौके पर ही तय कर पाएंगे कि सर्जरी की जरूरत है या नहीं।

तीन चरणों में बदलेगी दुनिया
AIIMS भोपाल के मैक्सोफेशियल सर्जन डॉ. बी.एल. सोनी और डॉ. अंशुल राय के नेतृत्व में यह प्रोजेक्ट तीन चरणों में पूरा होगा:
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प्रथम चरण: सबसे पहले चेहरे और सिर (Face & Head) की 3D इमेजिंग करने वाली मशीन बनेगी।
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द्वितीय चरण: इसके बाद पूरी बॉडी (Full Body) को स्कैन करने वाली यूनिट तैयार की जाएगी।
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तृतीय चरण: अंत में, कैंसर के इलाज में काम आने वाली ‘रेडिएशन मैपिंग’ के लिए इसे अपग्रेड किया जाएगा।

पूरी दुनिया के लिए गेम-चेंजर
मध्यप्रदेश में हर साल करीब 1.5 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं।
यह तकनीक न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरी दुनिया के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।
इस मशीन के आने से गांवों में बिना मरीज को बड़े शहर रेफर किए, मौके पर ही विशेषज्ञ स्तर की जांच संभव होगी।

जल्द ही इसका पहला मॉडल (प्रोटोटाइप) तैयार होने वाला है, जिसे बाद में व्यावसायिक स्तर पर लॉन्च किया जाएगा ताकि हर एंबुलेंस और स्वास्थ्य केंद्र में यह जीवन रक्षक मशीन उपलब्ध हो सके।


