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“लिव-इन में सुरक्षा की गारंटी नहीं, पत्नी का दर्जा मिले तभी सुरक्षित हैं महिलाएं”- मद्रास हाईकोर्ट

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Madras HC Live in Relationship: हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने लिव-इन रिलेशनशिप के एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद कड़ी टिप्पणी की है।

जस्टिस एस. श्रीमथी ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाएं तभी सुरक्षित रह सकती हैं, जब उन्हें ‘पत्नी का दर्जा’ मिले।

बिना कानूनी दर्जे के, अक्सर पुरुष रिश्ते के अंत में महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक युवक और युवती का है जो स्कूल के समय से एक-दूसरे को जानते थे।

दोनों के बीच प्रेम संबंध गहराया और अगस्त 2024 में उन्होंने घर से भागकर शादी करने का फैसला किया।

हालांकि, युवती के परिवार की शिकायत पर पुलिस ने उन्हें ढूंढ निकाला और घर वापस भेज दिया।

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इसके बाद आरोपी युवक लगातार शादी का वादा करता रहा, लेकिन किसी न किसी बहाने (जैसे परीक्षा या नौकरी) इसे टालता रहा। इस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बने।

आखिर में युवक ने शादी से इनकार कर दिया, जिसके बाद पीड़िता ने धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई।

कोर्ट में आरोपी का तर्क और कैरेक्टर असेसिनेशन

आरोपी ने कोर्ट से अग्रिम जमानत की गुहार लगाई। उसका कहना था कि संबंध आपसी सहमति से थे।

उसने यह भी तर्क दिया कि उसे महिला के किसी पुराने रिलेशनशिप के बारे में पता चला, जिससे उसका भरोसा टूट गया।

साथ ही उसने अपनी बेरोजगारी और आर्थिक तंगी को शादी न कर पाने का कारण बताया।

कोर्ट की टिप्पणी: ‘सुविधाजनक मॉडर्निटी’ पर प्रहार

जस्टिस श्रीमथी ने आरोपी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि आज के समय में पुरुष रिश्ते की शुरुआत में खुद को ‘मॉडर्न’ दिखाकर लिव-इन में रहते हैं।

लेकिन जैसे ही जिम्मेदारी उठाने या शादी की बात आती है, वे पितृसत्तात्मक सोच पर लौट आते हैं और महिला के चरित्र (Character) पर कीचड़ उछालने लगते हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में लिव-इन को लेकर स्पष्ट सुरक्षा नियमों की कमी के कारण महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं, इसलिए उन्हें वैवाहिक सुरक्षा देना समय की मांग है।

BNS की धारा 69: नया कानूनी हथियार

इस केस में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 का जिक्र रहा।

कोर्ट ने बताया कि पहले ऐसे मामलों को IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) या 376 (रेप) के तहत देखा जाता था, जिसमें ‘सहमति’ का पेच अक्सर आरोपी को बचा लेता था।

लेकिन अब BNS की धारा 69 स्पष्ट रूप से ‘शादी का झूठा वादा कर यौन संबंध बनाने’ को एक गंभीर और अलग अपराध मानती है।

अदालत ने कहा कि चूंकि आरोपी ने शादी का झांसा देकर संबंध बनाए और बाद में मुकर गया, इसलिए उसकी हिरासत में जांच (Custodial Investigation) जरूरी है।

इसी आधार पर उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो रिश्तों को केवल शारीरिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं और बाद में ‘सहमति’ का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।

कोर्ट ने यह संदेश साफ कर दिया है कि आधुनिकता के नाम पर किसी महिला के सम्मान के साथ खिलवाड़ कानूनी अपराध है।

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