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केदारनाथ-बद्रीनाथ समेत उत्तराखंड के 50 मंदिरों में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Non-Hindu Entry Ban Uttarakhand Temples: उत्तराखंड की पवित्र धरती को देवभूमि के नाम से जाना जाता है, लेकिन अब यहां के प्रसिद्ध मंदिरों और चारधाम यात्रा के नियमों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) और अन्य मंदिर समितियां अब धामों की मर्यादा और सनातन परंपराओं को बनाए रखने के लिए गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की योजना बना रही हैं।

क्या है पूरा मामला?

हाल ही में बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति और गंगोत्री-यमुनोत्री धाम की मंदिर समितियों के बीच एक सहमति बनी है।

इसके तहत एक औपचारिक प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, जिसमें स्पष्ट किया जाएगा कि इन पवित्र स्थलों पर केवल सनातन धर्म में आस्था रखने वाले लोगों को ही प्रवेश दिया जाए।

गंगोत्री मंदिर समिति ने तो अपनी बैठक में सर्वसम्मति से इस पर मुहर भी लगा दी है।

‘गैर-हिंदू’ की परिभाषा और किसे मिलेगी छूट?

समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि यहाँ ‘गैर-हिंदू’ का अर्थ उन लोगों से है जिनकी सनातन धर्म और इसकी परंपराओं में कोई आस्था नहीं है।

हालांकि, भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत को ध्यान में रखते हुए सिख, जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को इस दायरे से बाहर रखा गया है।

उन्हें हिंदू धर्म की ही शाखाएं माना गया है, इसलिए उनके प्रवेश पर कोई रोक नहीं होगी।

कौन-कौन से मंदिर आएंगे इस दायरे में?

यह प्रतिबंध केवल मुख्य चारधामों तक सीमित नहीं रहेगा।

बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अधीन आने वाले कुल 46 अन्य मंदिरों के लिए भी यही नियम प्रस्तावित हैं।

इसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • गंगोत्री, यमुनोत्री 
  • तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर और रुद्रनाथ जैसे पंच केदार।
  • जोशीमठ का नरसिंह मंदिर और भविष्य बद्री।
  • कालीमठ के सिद्धपीठ और उखीमठ के पौराणिक मंदिर।
  • बद्रीनाथ और केदारनाथ के भीतर स्थित छोटे उप-मंदिर और पवित्र कुंड।

सरकार और मुख्यमंत्री का क्या कहना है?

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस विषय पर बेहद संतुलित रुख अपनाया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड के मंदिर और तीर्थ स्थल करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र हैं।

इन मंदिरों का प्रबंधन तीर्थ सभाओं और संत समाज द्वारा किया जाता है।

सरकार उनके सुझावों को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। फिलहाल, 1939 के ‘द यूपी श्री बद्रीनाथ और श्री केदारनाथ टेंपल एक्ट’ का अध्ययन किया जा रहा है ताकि कोई भी निर्णय कानूनी रूप से मजबूत हो।

श्रद्धालुओं पर क्या होगा असर?

वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, केदारनाथ और बद्रीनाथ में लगभग 33 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए।

चूंकि यह यात्रा देश-दुनिया के लोगों के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है, इसलिए किसी भी नए नियम से यात्रियों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

हालांकि, समिति का तर्क है कि इससे मंदिर की पवित्रता और धार्मिक अनुशासन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

कानूनी प्रक्रिया और आगामी कदम

BKTC की आगामी बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव को आधिकारिक तौर पर रखा जाएगा।

अगर वहां से यह पास हो जाता है, तो इसे राज्य सरकार के पास भेजा जाएगा।

चूंकि 1939 का अधिनियम मंदिर समिति को ‘बायलॉज’ (उप-नियम) बनाने की शक्ति देता है, इसलिए इसे लागू करना संभव है, लेकिन इसके लिए सरकार की आधिकारिक पुष्टि और गजट नोटिफिकेशन की आवश्यकता होगी।

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