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“झूठे मामलों पर सजा हटाना UGC का फैसला था, हमारा नहीं”- नए नियमों पर दिग्विजय ने दी सफाई

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Digvijay Singh On UGC: UGC के नए ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ को लेकर देश भर के कैंपस में जारी विरोध और बहस के बीच कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक बड़ा बयान दिया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि यूजीसी ने संसदीय समिति की कुछ अहम सिफारिशों को नज़रअंदाज किया है और इस पूरे मुद्दे पर जानबूझकर दुष्प्रचार किया जा रहा है।

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर दी गई अपनी सफाई में कहा कि नए नियमों में से ‘झूठे मामले दर्ज करने वाले छात्रों को सजा’ के प्रावधान को हटाने का फैसला यूजीसी का अपना था और इसका संसदीय समिति की सिफारिशों से कोई लेना-देना नहीं था।

उनके मुताबिक, इस पूरे विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी सीधे यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय की बनती है।

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क्या है पूरा मामला?

इस पूरे विवाद की शुरुआत यूजीसी के उन नए नियमों से हुई है जिनका मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना है।

इन्हें ‘यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ नाम दिया गया है।

हालांकि, इन नियमों के कुछ प्रावधानों, खासकर सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों और शिक्षकों के एक बड़े हिस्से को चिंतित कर दिया है, जिसके चलते कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए हैं।

दिग्विजय सिंह ने बताया कि इन नियमों की नींव फरवरी 2025 में पड़ी, जब रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद और पीड़ित परिवारों के आग्रह पर भेदभाव रोकने के लिए एक ड्राफ्ट तैयार किया गया था।

संसदीय समिति ने दी थी ये अहम सिफारिशें

इस ड्राफ्ट को दिसंबर 2025 में संसद की शिक्षा समिति के सामने रखा गया।

समिति ने इन नियमों को सही दिशा में एक कदम बताया, लेकिन साथ ही इन्हें और मजबूत व स्पष्ट बनाने के लिए पांच बड़ी सिफारिशें भी कीं:

  1. ओबीसी को शामिल करना: भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) छात्रों और शिक्षकों के साथ होने वाले उत्पीड़न को भी शामिल किया जाए।

  2. दिव्यांगता को आधार मानना: भेदभाव के कारणों में दिव्यांगता को भी एक आधार के रूप में जोड़ा जाए।

  3. इक्विटी कमेटी का संतुलन: भेदभाव की शिकायतें सुनने वाली ‘इक्विटी कमेटी’ की संरचना में बदलाव किया जाए, ताकि उसके सदस्यों में से कम से कम 50% एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के हों। इससे निष्पक्ष फैसले की उम्मीद बढ़ती।

  4. भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा: नियमों में यह साफ़-साफ़ लिखा जाए कि भेदभाव किन हरकतों को माना जाएगा, ताकि संस्थान मनमाने ढंग से किसी शिकायत को खारिज या स्वीकार न कर सकें।

  5. पारदर्शिता और सहायता: हर साल भेदभाव के मामलों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करना, फैकल्टी के लिए अनिवार्य संवेदनशीलता प्रशिक्षण और पीड़ित छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य व कानूनी सहायता मुहैया कराना।

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UGC ने अहम सिफारिशों को नजरअंदाज किया

दिग्विजय सिंह के अनुसार, जनवरी 2026 में यूजीसी ने जो अंतिम नियम जारी किए, उनमें समिति की कुछ सिफारिशें (जैसे ओबीसी और दिव्यांगों को शामिल करना, वार्षिक रिपोर्ट और ट्रेनिंग का प्रावधान) तो मान ली गईं, लेकिन दो सबसे अहम बातों को छोड़ दिया गया।

पहली, इक्विटी कमेटी में एससी, एसटी, ओबीसी का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात, और दूसरी, भेदभाव की स्पष्ट और विस्तृत परिभाषा तय करने की सिफारिश।

इसी संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि नए नियमों से ‘झूठी शिकायत करने वाले पर कार्रवाई’ के प्रावधान को हटाने का जो विवाद हो रहा है, वह फैसला यूजीसी का अपना था।

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समिति ने केवल इतना कहा था कि इस प्रावधान का दुरुपयोग हो सकता है और इससे पीड़ित, शिकायत दर्ज कराने से डर सकते हैं। लेकिन इसे पूरी तरह हटाना या बदलना यूजीसी के अपने हाथ में था।

दिग्विजय सिंह का कहना है कि इस पूरे मामले में सरकार और यूजीसी को समिति की सभी सिफारिशों को गंभीरता से लेना चाहिए था, ताकि एक संतुलित, निष्पक्ष और प्रभावी नीति बन पाती जो सचमुच कैंपस में समानता ला सके।

उनके इस बयान के बाद अब यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय की तरफ से क्या स्पष्टीकरण आता है, यह देखने वाली बात होगी।

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