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सब कुछ मुफ्त मिलेगा तो लोग काम क्यों करेंगे? फ्रीबीज पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- रोजगार दे सरकार

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Supreme Court on Freebies: भारत में चुनाव जीतने का सबसे आसान फॉर्मूला बन चुका है—’मुफ्त की घोषणाएं’।

कहीं मुफ्त बिजली, कहीं मुफ्त पानी, तो कहीं सीधे बैंक खाते में कैश।

लेकिन अब देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने इस ‘फ्रीबीज कल्चर’ (मुफ्त की रेवड़ियों) पर बेहद सख्त और चिंताजनक टिप्पणी की है।

चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने साफ कहा है कि अगर सरकारें इसी तरह सब कुछ मुफ्त बांटती रहीं, तो देश का आर्थिक ढांचा चरमरा जाएगा और लोगों में काम करने की इच्छा ही खत्म हो जाएगी।

“सब फ्री मिलेगा, तो काम कौन करेगा?”

सुप्रीम कोर्ट की सबसे तीखी टिप्पणी काम करने की संस्कृति (Work Culture) को लेकर थी।

कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को सुबह से शाम तक का खाना, गैस, बिजली और राशन बिना किसी मेहनत के मुफ्त मिल जाएगा, तो उसके मन में काम करने का उत्साह खत्म हो जाएगा।

अदालत ने सरकारों को आईना दिखाते हुए कहा कि देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत है जो आत्मनिर्भर हों।

सरकारों का काम लोगों को ‘बैसाखी’ देना नहीं, बल्कि उन्हें ‘रोजगार’ देना होना चाहिए।

जब लोगों के पास रोजगार होगा, तो वे स्वाभिमान के साथ अपनी जरूरतें खुद पूरी कर सकेंगे।

कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या हम एक ऐसा देश बनाना चाहते हैं जहां लोग सिर्फ सरकारी मदद के भरोसे जिएं?

विकास बनाम लोकलुभावन वादे

CJI सूर्यकांत ने राज्यों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि आज देश के अधिकांश राज्य भारी कर्ज और घाटे (Revenue Deficit) में डूबे हुए हैं।

इसके बावजूद, चुनाव आते ही राजनीतिक दल खजाना खोल देते हैं।

कोर्ट ने पूछा, “अगर आप अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा मुफ्त की चीजों में लुटा देंगे, तो स्कूल, अस्पताल, सड़कें और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए पैसा कहां से आएगा?”

कोर्ट का तर्क सीधा है: विकास के लिए पैसा निवेश से आता है, मुफ्त बांटने से नहीं।

अगर 25% राजस्व सिर्फ फ्रीबीज में जा रहा है, तो राज्य की तरक्की की रफ्तार का रुकना तय है।

अमीरों को रियायत क्यों? ‘तुष्टीकरण’ पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही व्यावहारिक मुद्दा उठाया—विभेद (Differentiation)।

कोर्ट ने कहा कि गरीब और वंचित तबके को मुफ्त शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाएं देना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है।

लेकिन जो लोग बिल चुकाने में सक्षम हैं, उन्हें भी मुफ्त बिजली या पानी देना कहां का न्याय है?

तमिलनाडु के मामले का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि भले ही कोई बड़ा जमींदार हो, उसे भी 100 यूनिट बिजली मुफ्त मिल रही है।

यह टैक्स देने वाले आम आदमी के पैसे की बर्बादी है।

बिना यह देखे कि किसे जरूरत है और किसे नहीं, सबको एक ही लाठी से हांकना ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ का हिस्सा है, जिसे बंद किया जाना चाहिए।

चुनाव और मुफ्त योजनाओं का ‘टाइमिंग’

अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि अधिकतर बड़ी मुफ्त योजनाओं की घोषणा चुनाव के ठीक पहले ही क्यों की जाती है?

कोर्ट ने इसे राजनीतिक दलों की एक सोची-समझी रणनीति बताया, जो देश के दीर्घकालिक विकास (Long-term Development) के बजाय केवल तात्कालिक सत्ता हासिल करने पर केंद्रित होती है।

कोर्ट ने समाजशास्त्रियों, राजनेताओं और विचारकों से अपील की कि वे इस पर दोबारा सोचें कि यह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा।

बिजली कंपनियों पर बढ़ता बोझ

यह पूरी सुनवाई तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन (TANGEDCO) की याचिका पर हो रही थी।

राज्य सरकार की मुफ्त बिजली योजनाओं के कारण बिजली वितरण कंपनियां (DISCOMS) दिवालिया होने की कगार पर हैं।

कोर्ट ने इलेक्ट्रिसिटी रूल्स 2024 का हवाला देते हुए कहा कि कंपनियों को अपनी लागत वसूलने का पूरा हक है।

अगर सरकारें मुफ्त बिजली देना चाहती हैं, तो उसका बोझ कंपनियों पर नहीं डालना चाहिए।

क्या हम ‘परजीवियों’ की जमात बना रहे हैं?

इससे पहले भी 12 फरवरी 2025 को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि मुफ्त राशन बांटकर क्या आप लोगों को ‘परजीवी’ (Parasites) बना रहे हैं?

क्या इन लोगों को स्किल ट्रेनिंग देकर मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जा सकता?

81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देना गर्व की बात नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि हम उन्हें गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर निकालने में नाकाम रहे हैं।

कुलमिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) और मुफ्त की रेवड़ियों (Freebies) के बीच फर्क है।

गरीबों को राशन और स्वास्थ्य देना ‘कल्याण’ है, लेकिन सक्षम लोगों को वोट के लिए मुफ्त कैश या बिजली देना ‘रेवड़ी’ है।

अब समय आ गया है कि देश में ‘काम के बदले सम्मान’ की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए, न कि ‘मुफ्त के बदले वोट’ की।

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