Supreme Court on Freebies: भारत में चुनाव जीतने का सबसे आसान फॉर्मूला बन चुका है—’मुफ्त की घोषणाएं’।
कहीं मुफ्त बिजली, कहीं मुफ्त पानी, तो कहीं सीधे बैंक खाते में कैश।
लेकिन अब देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने इस ‘फ्रीबीज कल्चर’ (मुफ्त की रेवड़ियों) पर बेहद सख्त और चिंताजनक टिप्पणी की है।
चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने साफ कहा है कि अगर सरकारें इसी तरह सब कुछ मुफ्त बांटती रहीं, तो देश का आर्थिक ढांचा चरमरा जाएगा और लोगों में काम करने की इच्छा ही खत्म हो जाएगी।
The Supreme Court has strongly criticised the distribution of “freebies” by political parties of all states and expressed concern over its impact on public finances.
The Court has said that instead of distributing resources by freebie schemes, the political parties should come… pic.twitter.com/VdoC1p4XbE
— ANI (@ANI) February 19, 2026
“सब फ्री मिलेगा, तो काम कौन करेगा?”
सुप्रीम कोर्ट की सबसे तीखी टिप्पणी काम करने की संस्कृति (Work Culture) को लेकर थी।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को सुबह से शाम तक का खाना, गैस, बिजली और राशन बिना किसी मेहनत के मुफ्त मिल जाएगा, तो उसके मन में काम करने का उत्साह खत्म हो जाएगा।
अदालत ने सरकारों को आईना दिखाते हुए कहा कि देश को ऐसे नागरिकों की जरूरत है जो आत्मनिर्भर हों।
सरकारों का काम लोगों को ‘बैसाखी’ देना नहीं, बल्कि उन्हें ‘रोजगार’ देना होना चाहिए।
जब लोगों के पास रोजगार होगा, तो वे स्वाभिमान के साथ अपनी जरूरतें खुद पूरी कर सकेंगे।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या हम एक ऐसा देश बनाना चाहते हैं जहां लोग सिर्फ सरकारी मदद के भरोसे जिएं?
The Supreme Court made a remark on the freebies offered by states. CJI Surya Kant remarked that despite revenue losses, states are implementing schemes like cash handouts & free electricity. Who will pay for these? Taxpayers. The court advised prioritizing employment generation. pic.twitter.com/X08eLxVMYT
— The Whatup (@TheWhatup) February 19, 2026
विकास बनाम लोकलुभावन वादे
CJI सूर्यकांत ने राज्यों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि आज देश के अधिकांश राज्य भारी कर्ज और घाटे (Revenue Deficit) में डूबे हुए हैं।
इसके बावजूद, चुनाव आते ही राजनीतिक दल खजाना खोल देते हैं।
कोर्ट ने पूछा, “अगर आप अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा मुफ्त की चीजों में लुटा देंगे, तो स्कूल, अस्पताल, सड़कें और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए पैसा कहां से आएगा?”
कोर्ट का तर्क सीधा है: विकास के लिए पैसा निवेश से आता है, मुफ्त बांटने से नहीं।
अगर 25% राजस्व सिर्फ फ्रीबीज में जा रहा है, तो राज्य की तरक्की की रफ्तार का रुकना तय है।
STORY | SC slams freebies culture, says states should open avenues for employment
The Supreme Court on Thursday slammed the freebies culture, saying it was high time to revisit such policies that hamper the country’s economic development.
Taking note of the Tamil Nadu Power… pic.twitter.com/9TBvPIFgkK
— Press Trust of India (@PTI_News) February 19, 2026
अमीरों को रियायत क्यों? ‘तुष्टीकरण’ पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही व्यावहारिक मुद्दा उठाया—विभेद (Differentiation)।
कोर्ट ने कहा कि गरीब और वंचित तबके को मुफ्त शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाएं देना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है।
लेकिन जो लोग बिल चुकाने में सक्षम हैं, उन्हें भी मुफ्त बिजली या पानी देना कहां का न्याय है?
तमिलनाडु के मामले का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि भले ही कोई बड़ा जमींदार हो, उसे भी 100 यूनिट बिजली मुफ्त मिल रही है।
यह टैक्स देने वाले आम आदमी के पैसे की बर्बादी है।
बिना यह देखे कि किसे जरूरत है और किसे नहीं, सबको एक ही लाठी से हांकना ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ का हिस्सा है, जिसे बंद किया जाना चाहिए।
चुनाव और मुफ्त योजनाओं का ‘टाइमिंग’
अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि अधिकतर बड़ी मुफ्त योजनाओं की घोषणा चुनाव के ठीक पहले ही क्यों की जाती है?
कोर्ट ने इसे राजनीतिक दलों की एक सोची-समझी रणनीति बताया, जो देश के दीर्घकालिक विकास (Long-term Development) के बजाय केवल तात्कालिक सत्ता हासिल करने पर केंद्रित होती है।
कोर्ट ने समाजशास्त्रियों, राजनेताओं और विचारकों से अपील की कि वे इस पर दोबारा सोचें कि यह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा।
🚨 ”Why Cash Transfer Schemes Just Before Elections?’ Supreme Court Slams ‘Freebies’ Culture, Says Nation Building Hampered. pic.twitter.com/NhSRLtrP4D
— Gems (@gemsofbabus_) February 19, 2026
बिजली कंपनियों पर बढ़ता बोझ
यह पूरी सुनवाई तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन (TANGEDCO) की याचिका पर हो रही थी।
राज्य सरकार की मुफ्त बिजली योजनाओं के कारण बिजली वितरण कंपनियां (DISCOMS) दिवालिया होने की कगार पर हैं।
कोर्ट ने इलेक्ट्रिसिटी रूल्स 2024 का हवाला देते हुए कहा कि कंपनियों को अपनी लागत वसूलने का पूरा हक है।
अगर सरकारें मुफ्त बिजली देना चाहती हैं, तो उसका बोझ कंपनियों पर नहीं डालना चाहिए।
क्या हम ‘परजीवियों’ की जमात बना रहे हैं?
इससे पहले भी 12 फरवरी 2025 को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था।
कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि मुफ्त राशन बांटकर क्या आप लोगों को ‘परजीवी’ (Parasites) बना रहे हैं?
क्या इन लोगों को स्किल ट्रेनिंग देकर मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जा सकता?
81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देना गर्व की बात नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि हम उन्हें गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर निकालने में नाकाम रहे हैं।
▶️भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने फ्रीबीज बांट रहे राज्यों को कड़ी फटकार लगाई है।
▶️गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि आखिर करदाता के अलावा इन योजनाओं का खर्च और कौन उठाएगा।
▶️उन्होंने कहा कि भोजन और बिजली के बाद अब सीधा कैश ट्रांसफर होने pic.twitter.com/Pxf64ro5yO
— CJI Suryakant Sharma (@Cjikant) February 19, 2026
कुलमिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—कल्याणकारी योजनाओं (Welfare Schemes) और मुफ्त की रेवड़ियों (Freebies) के बीच फर्क है।
गरीबों को राशन और स्वास्थ्य देना ‘कल्याण’ है, लेकिन सक्षम लोगों को वोट के लिए मुफ्त कैश या बिजली देना ‘रेवड़ी’ है।
अब समय आ गया है कि देश में ‘काम के बदले सम्मान’ की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए, न कि ‘मुफ्त के बदले वोट’ की।


