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शीतला अष्टमी 2026: 11 मार्च को मनेगा बसोड़ा, जानें क्यों इस दिन घर में नहीं जलाया जाता चूल्हा?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Sheetala Ashtami 2026 Basoda: भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने का एक जरिया हैं।

ऐसा ही एक अनूठा पर्व है शीतला अष्टमी, जिसे उत्तर भारत में मुख्य रूप से ‘बसोड़ा’ के नाम से जाना जाता है।

होली के ठीक आठ दिन बाद आने वाला यह त्योहार शीतला माता को समर्पित है।

इस साल शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च 2026 को मनाया जाएगा।

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आइए जानते हैं पूजा का सही समय और आखिर क्यों इस दिन ‘बासी भोजन’ खाया जाता है…

शीतला अष्टमी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

पंचांग की गणना के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 11 मार्च 2026 को रात 01:54 बजे शुरू होगी और 12 मार्च को सुबह 04:19 बजे समाप्त होगी।

  • पूजा का शुभ समय: सुबह 06:35 से शाम 06:27 तक (11 मार्च)।
  • विशेष: सप्तमी के दिन (10 मार्च) भोजन बनाया जाएगा और अष्टमी के दिन माता को भोग लगाया जाएगा।

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क्यों वर्जित है चूल्हा जलाना?

शीतला अष्टमी के दिन घर की रसोई में आग जलाना वर्जित माना गया है। इसके पीछे एक गहरा धार्मिक विश्वास है।

माता शीतला को ‘शीतलता’ (ठंडक) की देवी माना जाता है। उनके नाम का अर्थ ही है ‘शीतल करने वाली’।

मान्यता है कि अष्टमी के दिन घर में चूल्हा जलाने से निकलने वाली गर्मी माता को रुष्ट कर सकती है।

इस दिन घर को पूरी तरह ठंडा रखा जाता है ताकि माता का आशीर्वाद परिवार पर बना रहे और घर के सदस्य बीमारियों से दूर रहें।

इसीलिए घर की महिलाएं सप्तमी की रात को ही सारा पकवान बना लेती हैं।

Sawan Somwar Vrat Thali

बासी भोजन (बसोड़ा) का धार्मिक और वैज्ञानिक तर्क

धार्मिक दृष्टिकोण:

माता शीतला को स्वच्छता और आरोग्य की देवी कहा जाता है।

उनके हाथों में झाड़ू और कलश होता है, जो सफाई और जल का प्रतीक है। उन्हें ठंडी चीजें अत्यंत प्रिय हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता को ठंडे (बासी) भोजन का भोग लगाने से वे प्रसन्न होती हैं और परिवार को चेचक (Smallpox), खसरा और त्वचा संबंधी रोगों से सुरक्षित रखती हैं।

Sawan Somwar Vrat Thali

वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

शीतला अष्टमी का समय वह होता है जब ऋतु परिवर्तन (Season Change) हो रहा होता है।

सर्दियों की विदाई और गर्मियों की आहट होती है।

विज्ञान के अनुसार, यह वह संधि काल है जब वातावरण में संक्रामक बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।

  1. पाचन तंत्र: गर्मी की शुरुआत में अग्नि तत्व बढ़ने लगता है। बासी भोजन (जो रात भर ठंडा हुआ हो) खाना इस बात का संकेत है कि अब से हमें गर्म और गरिष्ठ भोजन का त्याग कर हल्का और ठंडा भोजन शुरू कर देना चाहिए।

  2. रोग प्रतिरोधक क्षमता: आयुर्वेद के अनुसार, इस विशेष समय पर ठंडा भोजन शरीर के तापमान को संतुलित करने में मदद करता है।

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पूजा की सरल विधि

अगर आप पहली बार यह पूजा कर रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:

  • सप्तमी की तैयारी: एक दिन पहले मीठे चावल (ओलिया), रबड़ी, पूड़ी, हलवा और पुए बना लें।
  • स्नान और संकल्प: अष्टमी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ठंडे पानी से स्नान करें।
  • पूजा की थाली: थाली में रोली, हल्दी, अक्षत, जल का कलश और एक दिन पहले बना भोग रखें।
  • माता का पूजन: शीतला माता के मंदिर जाएं या घर पर ही उनकी तस्वीर के सामने दीपक (बिना जलाए या प्रतीकात्मक) और भोग अर्पित करें।
  • जल का छिड़काव: पूजा के बाद कलश के जल को पूरे घर में छिड़कें। माना जाता है कि इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

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