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हाथ में झाड़ू और गले में नीम की माला, स्वच्छता की देवी ने गधे को ही क्यों चुना अपना वाहन?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Mata Sheetala vehicle donkey: हिंदू धर्म में हर देवी-देवता का स्वरूप और उनकी सवारी हमें जीवन का कोई न कोई बड़ा सबक सिखाती है।

जब हम माता शीतला की बात करते हैं, तो हमारे मन में एक ऐसी देवी की छवि आती है जो शीतलता प्रदान करती हैं और चेचक (Pox) जैसी बीमारियों से रक्षा करती हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सिंह या हाथी जैसे शक्तिशाली जानवरों को छोड़कर माता ने ‘गधे’ को ही अपनी सवारी क्यों चुना?

या फिर उनके हाथों में झाड़ू और गले में नीम की माला का क्या महत्व है? आइए, इसे समझते हैं…

गधा ही क्यों है माता की सवारी?

अक्सर लोग गधे को एक साधारण जानवर मानते हैं, लेकिन माता शीतला की सवारी के रूप में इसके पीछे बहुत गहरा संदेश छिपा है।

गधा दुनिया के सबसे सहनशील और मेहनती जानवरों में से एक माना जाता है।

वह भारी बोझ उठाकर भी विचलित नहीं होता।

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वैज्ञानिक और पौराणिक दृष्टिकोण से देखें तो गधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बहुत मजबूत होती है, वह जल्दी बीमार नहीं पड़ता।

माता शीतला चूंकि रोगों का निवारण करने वाली देवी हैं, इसलिए गधा धैर्य और मजबूती का प्रतीक बनकर उनके साथ जुड़ा है।

यह हमें सिखाता है कि कठिन समय या बीमारी के दौर में हमें धैर्य और मानसिक मजबूती नहीं खोनी चाहिए।

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स्वच्छता, शीतलता और आरोग्य की देवी 

स्कंद पुराण के अनुसार, शीतला माता भगवती पार्वती का ही एक अवतार हैं।

उन्हें स्वच्छता, शीतलता और आरोग्य की देवी माना जाता है। माता का स्वरूप बहुत ही अनूठा और प्रतीकात्मक है:

  • सवारी: वे गर्दभ (गधे) पर विराजमान हैं।

  • हाथों में आयुध: उनके एक हाथ में झाड़ू (स्वच्छता का प्रतीक), दूसरे में कलश (पवित्र जल), तीसरे में सूप (अनाज शुद्ध करने वाला) और चौथे हाथ में नीम के पत्ते होते हैं।

  • महत्व: नीम के पत्ते और जल औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि माता रोगों का नाश करने वाली हैं। विशेषकर चेचक (Smallpox), खसरा और त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति के लिए उनकी पूजा अमोघ मानी जाती है।

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हाथ में झाड़ू और कलश का संदेश

माता शीतला के एक हाथ में झाड़ू और दूसरे में शीतल जल से भरा कलश होता है।

  • झाड़ू: यह प्रतीक है ‘सफाई’ का। गंदगी ही बीमारियों की जड़ होती है। माता का झाड़ू हमें संदेश देता है कि अपने घर और आसपास को साफ रखकर ही हम नकारात्मक ऊर्जा और रोगों को खुद से दूर रख सकते हैं।

  • कलश: कलश में भरा जल पवित्रता और शांति का प्रतीक है। जल न केवल प्यास बुझाता है, बल्कि तपते हुए शरीर को ठंडक भी देता है। यह जीवन को संतुलित रखने का संकेत है।

नीम की माला और आयुर्वेद का साथ

माता शीतला को नीम के पत्तों की माला पहने हुए दिखाया जाता है।

नीम को आयुर्वेद में ‘धरती का डॉक्टर’ कहा गया है।

यह कीटाणुनाशक होता है और त्वचा संबंधी रोगों में रामबाण इलाज है।

IMAGE CREDIT: FREEPIK

माता का यह रूप हमें प्रकृति से जुड़ने और प्राकृतिक उपचारों के महत्व को समझने की प्रेरणा देता है।

शीतला अष्टमी पर बासी भोजन (बसौड़ा) का भोग लगाना और माता की पूजा करना, असल में ऋतु परिवर्तन के समय खुद को बीमारियों से बचाने का एक तरीका है।

माता का पूरा स्वरूप हमें ‘स्वच्छता ही सेवा’ और ‘सादगी’ का पाठ पढ़ाता है।

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