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धर्म बदला तो छिन जाएगा दलित होने का दर्जा, नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

SC on Conversion SC/ST: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 24 मार्च, 2026 को एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) से ताल्लुक रखता है, लेकिन वह हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर कोई और धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) अपना लेता है, तो उसे मिलने वाला अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत खत्म हो जाएगा।

इसका सीधा मतलब यह है कि धर्म परिवर्तन के बाद वह व्यक्ति न तो आरक्षण का लाभ ले पाएगा और न ही SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत किसी सुरक्षा का दावा कर सकेगा।

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा विवाद आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिले के अनाकापल्ली से शुरू हुआ।

यहां चिंथदा आनंद नाम के एक व्यक्ति ने, जो मूल रूप से ‘माला’ समुदाय (SC) से थे, ईसाई धर्म अपना लिया था।

इतना ही नहीं, वह पिछले 10 सालों से एक चर्च में पादरी (Pastor) के रूप में काम कर रहे थे और रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित कराते थे।

विवाद तब बढ़ा जब चिंथदा ने अक्काला रामिरेड्डी और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवाया।

मामला जब आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने पाया कि चिंथदा अब हिंदू धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह एक सक्रिय ईसाई पादरी हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे में उन पर जातिगत अत्याचार का कानून लागू नहीं होता।

इसी फैसले को चुनौती देते हुए चिंथदा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, जहां उन्हें राहत मिलने के बजाय कानून की सख्त हिदायत का सामना करना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि “संवैधानिक आदेश, 1950” के खंड-3 में यह बिल्कुल साफ लिखा है कि जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी और धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने तर्क दिया कि अनुसूचित जाति का दर्जा उन सामाजिक बुराइयों और छुआछूत के आधार पर दिया गया था जो ऐतिहासिक रूप से हिंदू समाज का हिस्सा रही थीं।

चूंकि ईसाई और इस्लाम धर्म में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था या छुआछूत का स्थान नहीं है, इसलिए इन धर्मों में जाने के बाद व्यक्ति अपनी पुरानी जातिगत पहचान खो देता है।

संविधान का 1950 का आदेश क्या है?

आजादी के बाद, 1950 में राष्ट्रपति द्वारा एक आदेश जारी किया गया था।

इसमें स्पष्ट किया गया था कि केवल हिंदू धर्म के दलितों को ही ‘अनुसूचित जाति’ माना जाएगा।

बाद में, 1956 में इसमें संशोधन कर ‘सिख’ धर्म को जोड़ा गया और 1990 में ‘बौद्ध’ धर्म को भी इसमें शामिल किया गया।

आज की स्थिति यह है कि अगर कोई दलित ईसाई या मुस्लिम बनता है, तो वह पिछड़ा वर्ग (OBC) का लाभ तो ले सकता है (कुछ राज्यों में), लेकिन वह ‘अनुसूचित जाति’ (SC) के कोटे और कानूनों का हकदार नहीं रहता।

इस फैसले के बड़े मायने

  1. SC/ST एक्ट का दायरा: अब कोई भी व्यक्ति जो ईसाई या मुस्लिम बन चुका है, वह अपनी पुरानी जाति का हवाला देकर किसी के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज नहीं करवा पाएगा।

  2. आरक्षण पर असर: यह फैसला उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो धर्म बदलकर भी सरकारी नौकरियों या चुनावों में SC कोटे का लाभ उठा रहे हैं।

  3. वापसी का रास्ता: सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा है कि अगर कोई धर्म बदलकर वापस हिंदू बनता है, तो उसे अपनी जाति का लाभ तभी मिलेगा जब वह साबित करे कि समाज ने उसे स्वीकार कर लिया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन चर्चाओं पर विराम लगाता है जो लंबे समय से दलित ईसाइयों को SC का दर्जा देने की मांग कर रही थीं।

कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून की वर्तमान स्थिति के अनुसार, धर्म परिवर्तन का मतलब है जातिगत विशेष अधिकारों का त्याग करना।

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