Iran Internet Cable Threat: आज की दुनिया में अगर एक मिनट के लिए भी इंटरनेट बंद हो जाए, तो ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया थम गई है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस इंटरनेट को हम ‘बादलों’ (क्लाउड) या हवा (सैटेलाइट) में समझते हैं, उसका 97% हिस्सा असल में समुद्र के गहरे पानी में बिछी पतली तारों यानी ‘सबमरीन केबल्स’ के जरिए चलता है?
ताजा राजनीतिक हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं कि भारत समेत पूरी दुनिया के डिजिटल ढांचे पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने एक ऐसी धमकी दी है, जो दुनिया को डिजिटल ब्लैकआउट की ओर धकेल सकती है।
ईरान का दावा है कि यदि अमेरिका के साथ उसकी जंग बढ़ती है, तो वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में बिछी इन इंटरनेट केबल्स को काट सकता है।
क्या है होर्मुज का रास्ता और क्यों है यह इतना खास?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों में से एक है।
यह रास्ता ओमान और ईरान के बीच स्थित एक संकरा सा समुद्री गलियारा है।
अब तक दुनिया इसे केवल इसलिए जानती थी क्योंकि यहाँ से दुनिया का 20% कच्चा तेल और 25% एलएनजी (LNG) गुजरती है।
लेकिन इस तेल के व्यापार के साथ-साथ, इस समुद्री तलहटी के नीचे इंटरनेट केबल्स का एक विशाल जाल बिछा हुआ है।
यह जाल एशिया को यूरोप और अमेरिका से जोड़ता है। भारत के नजरिए से देखें तो हमारा पश्चिम की ओर जाने वाला (Westbound) एक-तिहाई इंटरनेट ट्रैफिक इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है।
ईरान की रणनीति: ‘चोकप्वाइंट’ पर वार
ईरान अच्छी तरह जानता है कि आज के दौर में मिसाइल चलाने से ज्यादा नुकसान इंटरनेट बंद करके किया जा सकता है।
ईरान के पास दो प्रमुख ‘चोकप्वाइंट’ हैं— लाल सागर (Red Sea) और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज।
लाल सागर में पहले से ही 17 प्रमुख केबल्स मौजूद हैं। आपको याद होगा कि 2024 की शुरुआत में लाल सागर में केबल्स कटने की खबरें आई थीं।
शांति के समय में भी उन केबल्स को ठीक करने में 6 महीने का वक्त लग गया था।
ईरान की धमकी इसलिए डरावनी है क्योंकि अगर युद्ध छिड़ गया, तो समुद्र के बीच में ‘रिपेयर शिप्स’ (मददगार जहाज) का जाना नामुमकिन हो जाएगा।
होर्मुज के रास्ते में AAE-1, FALCON, Tata-TGN Gulf और Gulf Bridge International जैसी बड़ी केबल्स बिछी हैं।
ईरान ने संकेत दिया है कि वह नेवल माइन्स (समुद्री सुरंगें), जहाजों के एंकर या अंडरवाटर सबोटाज के जरिए इन केबल्स को आसानी से नष्ट कर सकता है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इससे ईरान का खुद का इंटरनेट ठप नहीं होगा, क्योंकि उसने अपना खुद का ‘नेशनल इंफॉर्मेशन नेटवर्क’ (NIN) तैयार कर रखा है।
लेकिन अमेरिका, यूरोप और भारत के लिए यह अरबों डॉलर की चोट होगी।
भारत के लिए खतरे की घंटी
भारत के लिए यह स्थिति किसी ‘डिजिटल इमरजेंसी’ से कम नहीं है।
भारत का अधिकांश डेटा ट्रैफिक SEA-ME-WE, AAE-1 और EIG जैसे केबल सिस्टम पर निर्भर है।
अगर होर्मुज में ये तार कटते हैं, तो इसके परिणाम कुछ इस तरह होंगे:
* धीमी इंटरनेट रफ्तार और लेटेंसी: इंटरनेट पूरी तरह बंद न भी हो, तो भी डेटा को लंबे ‘पैसिफिक रूट’ (प्रशांत महासागर के रास्ते) से भेजना पड़ेगा। इससे ‘लेटेंसी’ बढ़ जाएगी। आसान भाषा में कहें तो, जो वीडियो अभी तुरंत प्ले होता है, वह बहुत देर तक बफरिंग करेगा। वीडियो कॉलिंग और गेमिंग जैसे काम लगभग नामुमकिन हो जाएंगे।
* बैंकिंग और शेयर बाजार: हमारे बैंक, स्टॉक मार्केट और ऑनलाइन पेमेंट गेटवे (जैसे UPI) इसी इंटरनेट कनेक्टिविटी पर चलते हैं। जरा सोचिए, अगर पेमेंट गेटवे फेल हो जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा?
* IT सेक्टर पर संकट: भारत का IT और आउटसोर्सिंग सेक्टर करीब 23.48 लाख करोड़ रुपये ($250 बिलियन) का है। हजारों कंपनियां अमेरिका और यूरोप के क्लाइंट्स को रियल-टाइम सर्विस देती हैं। अगर इंटरनेट की गति धीमी हुई या कनेक्टिविटी टूटी, तो करोड़ों के कॉन्ट्रैक्ट्स रद्द हो सकते हैं।
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
एक आम इंटरनेट यूजर के लिए इसका मतलब होगा—यूट्यूब पर बफरिंग, इंस्टाग्राम फीड का लोड न होना और नेटफ्लिक्स का बंद पड़ जाना।
वर्क फ्रॉम होम करने वाले लोगों और क्लाउड आधारित सेवाओं का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों के लिए यह एक बुरा सपना साबित हो सकता है।
यहाँ तक कि विदेशों में बैठे रिश्तेदारों से बात करना और पैसे भेजना (Remittance) भी बहुत मुश्किल और धीमा हो जाएगा।
क्या है बचाव का रास्ता?
इस खतरे ने पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम इंटरनेट के लिए केवल समुद्र के नीचे की तारों पर निर्भर रह सकते हैं?
* सैटेलाइट इंटरनेट: भारत और दुनिया के कई देश अब एलन मस्क की स्टारलिंक (Starlink) जैसी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को एक मजबूत बैकअप के रूप में देख रहे हैं। सैटेलाइट इंटरनेट समुद्र की तारों पर निर्भर नहीं होता।
* वैकल्पिक रूट्स: विशेषज्ञ अब ऐसे रास्तों पर केबल्स बिछाने की योजना बना रहे हैं जो इन संवेदनशील युद्ध क्षेत्रों (War Zones) को बायपास कर सकें।
* डिजिटल संप्रभुता: भारत भी अब अपनी इंटरनेट सुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क हो गया है और डेटा के वैकल्पिक रास्तों के लिए निवेश बढ़ा रहा है।
होर्मुज का यह संकट सिर्फ दो देशों के बीच की जंग नहीं है, बल्कि यह एक ‘डिजिटल वॉरफेयर’ की शुरुआत हो सकती है।
जहाँ पहले युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ा जाता था, अब वह समुद्र की गहराई में बिछी उन तारों तक पहुँच गया है जो पूरी दुनिया को आपस में जोड़े हुए हैं।
भारत के लिए यह अपनी डिजिटल सुरक्षा को और पुख्ता करने और बैकअप विकल्पों को जल्द से जल्द तैयार करने का एक कड़ा संदेश है।
फिलहाल, दुनिया की नजरें ईरान और अमेरिका के अगले कदमों पर टिकी हैं, क्योंकि होर्मुज की इन लहरों के नीचे पूरी दुनिया का भविष्य छिपा है।
