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देश में पहली बार वक्फ बोर्ड में हुई दो हिंदुओं की एंट्री, मनोज मालपानी और अनिमेष भार्गव को मिली जिम्मेदारी

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

First Hindu members in Waqf Board: मध्य प्रदेश ने देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में एक नया इतिहास रच दिया है।

भारत में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी राज्य के वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम (हिंदू) सदस्यों को जगह दी गई है।

मध्य प्रदेश सरकार ने सूबे के वक्फ बोर्ड का दोबारा गठन करते हुए इंदौर के रहने वाले मनोज मालपानी और गुना (राघौगढ़) के निवासी अनिमेष भार्गव को इसका सरकारी सदस्य नियुक्त किया है।

इसके साथ ही, सनवर पटेल को एक बार फिर से इस बोर्ड का अध्यक्ष (चेयरमैन) चुन लिया गया है।

मध्य प्रदेश बना देश का पहला राज्य

एमपी सरकार का दावा है कि नए ‘वक्फ (संशोधन) अधिनियम-2025’ के नियमों को लागू करते हुए बोर्ड का गठन करने वाला वह पूरे देश का पहला राज्य बन गया है।

इस नए पुनर्गठित बोर्ड में कुल 10 सदस्यों को शामिल किया गया है।

अगर पुराने नियमों की बात करें, तो ‘वक्फ अधिनियम-1995’ के मुताबिक राज्य वक्फ बोर्ड में सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोगों को ही सदस्य बनाया जाता था।

सरकार जिन लोगों को अपनी तरफ से नामित या नॉमिनेट करती थी, उनके लिए भी मुस्लिम होना कानूनी रूप से जरूरी था।

लेकिन साल 2025 में जब कानून बदला गया, तो यह अनिवार्य कर दिया गया कि हर राज्य के वक्फ बोर्ड में कम से कम दो सदस्य गैर-मुस्लिम समुदाय से होने चाहिए।

नजमा हेपतुल्ला का कार्यकाल बरकरार

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 4 जुलाई 2026 को जारी किए गए आधिकारिक राजपत्र (अधिसूचना) के मुताबिक, यह पूरा गठन वक्फ अधिनियम की धारा 13(1) के तहत किया गया है।

इस नए बोर्ड में पूर्व केंद्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला को भी शामिल रखा गया है।

चूंकि उनका पुराना कार्यकाल अभी बचा हुआ है, इसलिए वे अप्रैल 2028 तक इस पद पर बनी रहेंगी।

सरकार का मानना है कि इस नए और मिले-जुले बोर्ड के आने से वक्फ की कीमती जमीनों और संपत्तियों की देखरेख में पहले से ज्यादा पारदर्शिता (ट्रांसपेरेंसी) आएगी और कामकाज का तरीका बेहतर होगा।

आखिर क्या होता है वक्फ बोर्ड और इसके काम?

आसान शब्दों में समझें तो वक्फ उस संपत्ति (जमीन, मकान या दुकान) को कहते हैं, जिसे कोई मुस्लिम व्यक्ति या संस्था अपनी मर्जी से धर्म, पढ़ाई-लिखाई या समाज की भलाई के लिए हमेशा-हमेशा के लिए दान कर देता है।

इसमें मस्जिद, कब्रिस्तान, दरगाह, मदरसे और अनाथालय जैसी संपत्तियां आती हैं।

वक्फ बोर्ड के मुख्य काम इस प्रकार हैं:

  • राज्य के अंदर आने वाली सभी वक्फ संपत्तियों का सही रिकॉर्ड (खाता) तैयार करना और उन्हें सुरक्षित रखना।
  • वक्फ की जमीनों से होने वाली कमाई और उसके खर्चों पर पैनी नजर रखना।
  • अगर किसी वक्फ संपत्ति पर कोई अवैध कब्जा या कानूनी विवाद है, तो कोर्ट में उसकी पैरवी करना।
  • यह पक्का करना कि वक्फ की कमाई का इस्तेमाल गरीब बच्चों की पढ़ाई, अनाथों की मदद और धार्मिक कामों में ही हो।

 

कब और कैसे बदला यह कानून?

केंद्र सरकार ने पिछले साल यानी 2025 में इस कानून को संसद से पास कराया था।

2 अप्रैल को लोकसभा और 3 अप्रैल को राज्यसभा में इस पर लंबी चर्चा हुई थी, जिसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 5 अप्रैल 2025 को इस बिल पर अपने हस्ताक्षर किए।

8 अप्रैल 2025 से यह कानून पूरे देश में लागू हो गया था।

इसी कानून के तहत अब केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्यों के वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को रखना अनिवार्य कर दिया गया है, जिसकी शुरुआत मध्य प्रदेश से हो चुकी है।

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