Amit shah attacks congress: देश के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस के बीच राजनीतिक घमासान तेज हो गया है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि पार्टी कार्यक्रमों में पूरा ‘वंदे मातरम’ न गाना राष्ट्रविरोधी है और यह मुस्लिम तुष्टीकरण की पुरानी राजनीति का हिस्सा है।
शाह ने आरोप लगाया कि साल 1937 में कांग्रेस ने इस राष्ट्रगीत के टुकड़े करके देश के विभाजन की नींव रखी थी और आज राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी फिर से वही गलती दोहरा रही है।

विवाद की मुख्य वजह क्या है?
हाल ही में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक में यह तय किया गया था कि पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के सभी 6 पैराग्राफ (अंतरे) गाने के बजाय केवल शुरुआती दो पैराग्राफ ही गाए जाएंगे।
कांग्रेस के इस फैसले के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने इसे हाथों-हाथ लिया और कांग्रेस की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए।
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत केवल एक रचना नहीं है, बल्कि देश की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले लाखों स्वतंत्रता सेनानियों की भावना का प्रतीक है।

शाह के मुताबिक, संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और राष्ट्रगीत के सम्मान को खारिज करके कांग्रेस एक बार फिर देश को बांटने वाली सोच को बढ़ावा दे रही है।
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15 अगस्त से शुरू हुई थी जुबानी जंग
दरअसल, इस विवाद की शुरुआत 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हुई थी।
दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान ‘वंदे मातरम’ गाया जा रहा था।
भारतीय जनता पार्टी ने एक वीडियो जारी कर आरोप लगाया कि जब पूरा राष्ट्रगीत गाया जाने लगा, तो पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उसे बीच में ही रुकवाने की कोशिश की।

भाजपा का यह भी दावा था कि इस दौरान मंच पर मौजूद राहुल गांधी भी असहज नजर आ रहे थे।
हालांकि, कांग्रेस ने भाजपा के इन सभी आरोपों का मजबूती से खंडन किया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव जयराम रमेश ने सफाई देते हुए कहा कि मुख्यालय में पूरा ‘वंदे मातरम’ गाया गया था और इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सोनिया गांधी का इशारा गीत रुकवाने के लिए नहीं था, बल्कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मंगवाने का इशारा कर रही थीं क्योंकि वे काफी देर से खड़े थे।
वंदे मातरम को लेकर नया कानून और नियम
यह पूरा विवाद ऐसे समय में गहराया है जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर कड़े नियम लागू किए हैं।
संसद द्वारा पास किए गए नए कानून के तहत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बराबर का कानूनी दर्जा और संरक्षण दिया गया है।
* सजा का प्रावधान: यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ‘वंदे मातरम’ का अपमान करता है या इसके गायन में बाधा डालता है, तो उसे 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं।
* प्रोटोकॉल और समयसीमा: गृह मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरों को पूरा गाया जाएगा, जिसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड तय की गई है।
* कार्यक्रमों का क्रम: यदि किसी सरकारी या आधिकारिक कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ दोनों गाए जाने हैं, तो सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और उसके बाद राष्ट्रगान होगा। यदि किसी राज्य का अपना अलग राज्य-गीत है, तो पहले राज्य-गीत, फिर ‘वंदे मातरम’ और अंत में राष्ट्रगान गाया जाएगा।
* स्कूलों में अनिवार्यता: देश के सभी स्कूलों में दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत के साथ करना अनिवार्य किया गया है। इसके गायन के समय हर व्यक्ति को सम्मान में खड़ा होना होगा।
* छूट: सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले ‘वंदे मातरम’ बजाना अनिवार्य नहीं होगा। इसके अलावा किसी डॉक्यूमेंट्री या न्यूजरील में यदि यह गीत बजता है, तो दर्शकों को खड़े होने की बाध्यता से दूर रखा गया है।

‘वंदे मातरम’ का 150 साल पुराना ऐतिहासिक सफर
‘वंदे मातरम’ का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक अभूतपूर्व योगदान रहा है।
* रचना और प्रकाशन: इस महान गीत की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को की थी। बाद में 1882 में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया और यह उनकी पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ।
* पहला सार्वजनिक गायन: 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार सार्वजनिक मंच से इसे पूरे सुरों के साथ गाया था, जिसने पूरे देश में देशभक्ति की एक नई लहर पैदा कर दी थी।
* क्रांति का नारा: अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहे सेनानियों के लिए ‘वंदे मातरम’ एक ऐसा नारा बन गया था, जिसे बोलते हुए सैकड़ों क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए।

संसद में चर्चा और नेहरू की चिट्ठी का जिक्र
‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने के अवसर पर संसद के शीतकालीन सत्र में इस पर विशेष चर्चा भी हुई थी।
इस दौरान भी भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी बहस देखने को मिली थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में बोलते हुए कहा था कि 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में आकर राष्ट्रगीत के टुकड़े कर दिए थे।
भाजपा का आरोप है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लगता था कि पूरे ‘वंदे मातरम’ के गायन से मुस्लिम समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं।
इसके सबूत के तौर पर भाजपा ने 1937 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखी गई एक चिट्ठी का भी हवाला दिया था।

गृहमंत्री अमित शाह का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अब 1937 में की गई उसी ऐतिहासिक भूल को सुधारने का काम कर रही है, ताकि देश की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत किया जा सके।
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