Jaya Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
मान्यता है कि यह व्रत मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करता है।
साल में 24 एकादशियां होती हैं, जिनमें माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है।
इस बार यह व्रत 29 जनवरी, गुरुवार को रखा जाएगा।
क्या है जया एकादशी का महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जया एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति भूत-प्रेत आदि नकारात्मक शक्तियों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
यह व्रत न केवल व्रती के लिए, बल्कि उसके पितरों के उद्धार के लिए भी फलदायी माना गया है।
पद्म पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इस व्रत को करता है, वह मृत्यु के बाद वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।
इसकी महिमा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताई थी।
इस व्रत को करने से भूत-पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है।
ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है, शत्रुओं पर विजय मिलती है तथा धन, यश, समृद्धि और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शुभ मुहूर्त और तिथि
हिंदू पंचांग के मुताबिक, एकादशी तिथि 28 जनवरी को शाम 04:35 बजे से शुरू होकर 29 जनवरी को दोपहर 01:55 बजे तक रहेगी।
चूंकि एकादशी तिथि 29 जनवरी को प्रातः काल में ही लगभग पूरे दिन विद्यमान है, इसलिए उपवास 29 जनवरी को ही रखा जाएगा।
व्रत का पारण (उपवास तोड़ना) 30 जनवरी की सुबह, द्वादशी तिथि के दौरान किया जाता है।
इस साल जया एकादशी के दिन रवि योग और भद्रावास का संयोग बन रहा है, जो स्वास्थ्य लाभ और व्यापारिक उन्नति का सूचक है।
साथ ही, रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र का योग भी बन रहा है, जो भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
व्रत और पूजा की विधि
- व्रत वाले दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- घर के मंदिर या पूजा स्थल को साफ करके भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- व्रत का संकल्प लेकर फल, फूल, तुलसी दल, धूप-दीप से भगवान की पूजा-आराधना करें।
- दिन भर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उपवास रखें। फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है।
- रात्रि में भजन-कीर्तन करें और विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
- अगले दिन सुबह योग्य ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा देकर ही व्रत का पारण करें।
नोट: व्रत रखने की क्षमता व स्वास्थ्य के अनुसार ही नियमों का पालन करें। निर्जला व्रत केवल स्वस्थ व्यक्तियों द्वारा ही किया जाना चाहिए।


