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महाशिवरात्रि पर 19 साल बाद बना 6 ग्रहों का विशेष संयोग, दुर्लभ ‘त्रिकोण योग’ में होगी महादेव की पूजा

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Mahashivratri 2026: आस्था और अध्यात्म के महापर्व महाशिवरात्रि को लेकर इस बार भक्तों में भारी उत्साह है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, साल 2026 की महाशिवरात्रि बेहद खास होने वाली है।

करीब 19 साल के लंबे अंतराल के बाद ग्रहों की एक ऐसी स्थिति बन रही है, जो साधना और सिद्धि के लिए अत्यंत फलदायी मानी जा रही है

15 फरवरी को मनाए जाने वाले इस पर्व पर 6 प्रमुख ग्रह विशेष योग बना रहे हैं, जैसा संयोग पिछली बार वर्ष 2007 में देखा गया था।

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ग्रहों की स्थिति और शुभ योग

पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर इस बार ग्रहों का अनोखा जमावड़ा लग रहा है।

कुंभ राशि में सूर्य, बुध, शुक्र और राहु की युति होगी, जबकि केतु सिंह राशि में और चंद्रमा मकर राशि में विराजमान रहेंगे।

ग्रहों की इस विशेष स्थिति से ‘त्रिकोण योग’ और ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ का निर्माण हो रहा है।

ज्योतिषविदों का मानना है कि इस योग में की गई पूजा का फल कई गुना बढ़कर मिलता है।

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उज्जैन के महाकाल मंदिर में भव्य तैयारियां

विश्व प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, उज्जैन के बाबा महाकालेश्वर मंदिर में उत्सव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

कलेक्टर और मंदिर प्रशासन की देखरेख में पूरे परिसर का कायाकल्प किया जा रहा है।

6 फरवरी से ही ‘शिव नवरात्रि’ के तहत अनुष्ठान शुरू हो गए हैं।

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मंदिर के मुख्य शिखर की धुलाई, कोटितीर्थ कुंड की सफाई और प्रांगण में स्थित 40 छोटे मंदिरों की रंग-पुताई का काम अंतिम चरण में है।

प्रशासन का मुख्य फोकस भक्तों की सुगम दर्शन व्यवस्था पर है, जिसके लिए विशेष रूट चार्ट तैयार किया जा रहा है।

चार प्रहर की पूजा: सिद्धि का द्वार

महाशिवरात्रि पर केवल सुबह की पूजा ही काफी नहीं होती; शिव महापुराण के अनुसार, इस दिन ‘चार प्रहर’ की पूजा का विशेष विधान है।

जो भक्त पूरी रात जागकर महादेव की आराधना करना चाहते हैं, उनके लिए समय इस प्रकार है:

  1. प्रथम प्रहर (शाम 6:19 से): यह प्रदोष काल है। इसमें गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

  2. द्वितीय प्रहर (रात 9:40 से): इस समय दही से अभिषेक करने पर पारिवारिक सुख और शांति मिलती है।

  3. तृतीय प्रहर (मध्य रात्रि 12:41 से): इसे ‘निशिथ काल’ कहते हैं। दूध से अभिषेक करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

  4. चतुर्थ प्रहर (सुबह 3:18 से सूर्योदय तक): यह ब्रह्म मुहूर्त का समय है। इस समय विधि-विधान से की गई पूजा मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है।

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विवाह या प्राकट्य?

आम धारणा है कि महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।

हालांकि, विद्वानों और धार्मिक ग्रंथों का मत इससे भिन्न है।

अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के अनुसार, यह दिन वास्तव में महादेव के ‘प्राकट्य’ (उत्पत्ति) का दिन है।

इसी दिन भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे ताकि ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार को शांत कर सृष्टि का संतुलन बनाया जा सके।

शिव महापुराण के अनुसार, माता सती और पार्वती से उनके विवाह अलग-अलग तिथियों पर हुए थे, न कि महाशिवरात्रि के दिन।

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कैसे करें सरल पूजा और व्रत?

भक्तों के लिए व्रत के नियम बहुत सरल हैं।

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और महादेव के सामने व्रत का संकल्प लें।
  • पूरे दिन निराहार रहने का प्रयास करें, हालांकि शारीरिक शक्ति के अनुसार फल और दूध का सेवन किया जा सकता है।
  • पूजा करते समय अपना मुख उत्तर दिशा की ओर रखें और शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, धतूरा और अक्षत अर्पित करें।
  • “ॐ नमः शिवाय” का निरंतर जाप आपके मन को शांत और एकाग्र रखेगा।
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