Why fly kites on Makar Sankranti: मकर संक्रांति सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि खगोलीय घटना और ऋतु परिवर्तन का प्रतीक भी है।
जब सूर्य देव धनु राशि को त्यागकर अपने पुत्र शनि की राशि ‘मकर’ में प्रवेश करते हैं, तो इस अवसर को ‘मकर संक्रांति’ के रूप में उल्लास के साथ मनाया जाता है।
साल 2026 में सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी 2026, बुधवार को दोपहर लगभग 3:13 बजे होगा।
शास्त्रों के अनुसार, अगर संक्रांति सूर्यास्त के निकट या दोपहर के बाद हो, तो उसका पुण्यकाल और स्नान-दान अगले दिन किया जाता है।
इसलिए, 15 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति का पर्व मनाना ही श्रेष्ठ और शास्त्र सम्मत होगा।

पतंग उड़ाने की परंपरा: सिर्फ मनोरंजन या कुछ और?
मकर संक्रांति का नाम आते ही आंखों के सामने रंग-बिरंगी पतंगें तैरने लगती हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे गहरे कारण छिपे हैं?
वैज्ञानिक कारण:
मकर संक्रांति के समय उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड होती है।
विज्ञान कहता है कि इस दौरान सूर्य की किरणें हमारे शरीर के लिए ‘अमृत’ समान होती हैं।
पतंग उड़ाने के बहाने लोग घंटों धूप में बिताते हैं, जिससे शरीर को भरपूर विटामिन-D मिलता है।
यह हड्डियों को मजबूत करता है, त्वचा के संक्रमण को दूर करता है और सर्दियों में होने वाली सुस्ती को मिटाकर शरीर को ऊर्जावान बनाता है।
धार्मिक और ऐतिहासिक पक्ष:
इतिहासकारों के अनुसार, मुगल काल में पतंगबाजी एक शाही शौक बन गया था, जो धीरे-धीरे जनमानस का हिस्सा बन गया।
वहीं, कुछ मान्यताओं के अनुसार पतंग को खुशहाली और आजादी का प्रतीक मानकर नए मौसम (बसंत के आगमन) का स्वागत किया जाता है।

क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति? (पौराणिक कथा)
इस पर्व के पीछे पिता-पुत्र के प्रेम की एक सुंदर कथा है।
कहा जाता है कि सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव के संबंध मधुर नहीं थे।
लेकिन मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव स्वयं अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि) उनसे मिलने जाते हैं।
चूंकि शनि मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए यह दिन वैचारिक मतभेद भुलाकर रिश्तों में मिठास घोलने का संदेश देता है।
इसीलिए इस दिन तिल और गुड़ के लड्डू खाए जाते हैं, जो कड़वाहट को खत्म करने का प्रतीक हैं।

उत्तरायण का महत्व: देवताओं का दिन
मकर संक्रांति से सूर्य ‘उत्तरायण’ हो जाते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि और उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है।
इसी दिन से ‘खरमास’ समाप्त होता है और मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश की शुरुआत हो जाती है।
भीष्म पितामह ने भी अपने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण के सूर्य की ही प्रतीक्षा की थी, क्योंकि इस समय देह त्यागने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
दान और खिचड़ी का महत्व
इस पर्व को उत्तर भारत में ‘खिचड़ी’ के नाम से भी जाना जाता है।
इस दिन नए अनाज (चावल और दाल) की खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता है और दान किया जाता है।
काले तिल, गुड़, कंबल और घी का दान इस दिन विशेष फलदायी माना गया है।
मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस प्राप्त होता है।


