Harsiddhi Mata Mandir Ujjain: भारत में वैसे तो देवी हरसिद्धि के कई मंदिर हैं, लेकिन वाराणसी, उज्जैन और तरावली (भोपाल) में स्थित हरसिद्धि मंदिर का विशेष पौराणिक महत्व है।
उज्जैन में स्थित हरसिद्धि माता मंदिर, 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां देवी सती की कोहनी गिरी थी.
यह मंदिर भैरव पर्वत पर शिप्रा नदी के राम घाट के पास स्थित है
हरसिद्धि माता मंदिर के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें
51 शक्तिपीठों में से एक:
यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरने की मान्यता है.
कोहनी गिरने की मान्यता:
मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी.
दीप स्तंभ:
मंदिर प्रांगण में दो बड़े दीप स्तंभ हैं, जिन पर नवरात्रि के दौरान 5 दिन तक दीप मालाएं लगाई जाती हैं.
आरती:
मंदिर में शाम को संध्या आरती होती है, जो देखने लायक होती है.
महाकालेश्वर मंदिर के पास:
यह मंदिर महाकालेश्वर मंदिर से 2 मिनट की पैदल दूरी पर स्थित है.
तांत्रिक महत्व:
मंदिर का तांत्रिक महत्व भी है और यहां श्रीसूक्त और वेदोक्त मंत्रों के साथ पूजा होती है.
सम्राट विक्रमादित्य ने 11 बार चढ़ाया था शीश
किंवदंती है कि सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे और उन्होंने 11 बार अपना सिर माता को अर्पित किया था.
-मान्यता है कि दो हजार वर्ष पूर्व काशी नरेश गुजरात की पावागढ़ माता के दर्शन करने गए थे।
-वे अपने साथ मां दुर्गा की एक मूर्ति लेकर आए और मूर्ति की स्थापना की और सेवा करने लगे।
-उनकी सेवा से प्रसन्न होकर देवी मां काशी नरेश को प्रतिदिन सवा मन सोना देती थीं।
-जिसे वो जनता में बांट दिया करते थे।
-यह बात उज्जैन तक फैली तो वहां की जनता काशी के लिए पलायन करने लगी।
-उस समय उज्जैन के राजा विक्रमादित्य थे। जनता के पलायन से चिंतित विक्रमादित्य बेताल के साथ काशी पहुंचे।
-वहां उन्होंने बेताल की मदद से काशी नरेश को गहरी निद्रा में लीन कर स्वयं मां की पूजा करने लगे।
-तब माता ने प्रसन्न होकर उन्हें भी सवा मन सोना दिया।
-विक्रमादित्य ने वह सोना काशी नरेश को लौटाने की पेशकश की।
-लेकिन काशी नरेश ने विक्रमादित्य को पहचान लिया और कहा कि तुम क्या चाहते हो।
-तब विक्रमादित्य ने मां को अपने साथ ले जाने का अनुरोध किया। काशी नरेश के न मानने पर विक्रमादित्य ने 12 वर्ष तक वहीं रहकर तपस्या की।
-मां के प्रसन्न होने पर उन्होंने दो वरदान मांगे, पहला वह अस्त्र, जिससे मृत व्यक्ति फिर से जीवित हो जाए और दूसरा अपने साथ उज्जैन चलने का।
-तब माता ने कहा कि वे साथ चलेंगी, लेकिन जहां तारे छिप जाएंगे, वहीं रुक जाएंगी।
-लेकिन उज्जैन पहुंचने सेे पहले तारे अस्त हो गए। इस तरह जहां पर तारे अस्त हुए मां वहीं पर ठहर गईं। इस तरह वह स्थान तरावली (भोपाल) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
-तब विक्रमादित्य ने दोबारा 12 वर्ष तक कड़ी तपस्या की और आपने सिर की बलि मां को चढ़ा दी, लेकिन मां ने विक्रमादित्य को जीवित कर दिया।
-यही क्रम 11 बार चला और राजा विक्रमादित्य अपनी जिद पर अड़े रहे।
-ऐसे में मां ने अपनी बलि चढ़ाकर सिर विक्रमादित्य को दे दिया और कहा कि इसे उज्जैन में स्थापित करो।
-तभी से मां के तीनों अंश यानी चरण काशी में अन्नपूर्णा के रूप में, धड़ तरावली (भोपाल) में और सिर उज्जैन में हरसिद्धी माता के रूप में पूजे जाते हैं
उज्जैन की रक्षा करती है देवी हरसिद्धि
उज्जैन में दो शक्तिपीठ माने जाते हैं। पहला हरसिद्धि माता और दूसरा गढ़कालिका माता का शक्तिपीठ।
एक धार्मिक मान्यता यह भी है कि उज्जैन की रक्षा के लिए आसपास कई देवियां है, उनमें से एक देवी हरसिद्धि भी है।
हरसिद्धि मंदिर में है चार प्रवेशद्वार
उज्जैन स्थित देवी हरसिद्धि मंदिर में 4 प्रवेशद्वार हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की तरफ है।
मंदिर के दक्षिण-पूर्व के कोण में एक बावड़ी बनी हुई है, जिसके अंदर एक स्तंभ है।
यहां श्री यंत्र बना हुआ स्थान है। हर साल नवरात्रि के दौरान 5 दिन स्तंभ में दीप जलाएं जाते हैं
शक्तिपीठ होने के कारण इस मंदिर का विशेष महत्व है।
माँ सती की कोहनी गिरी थी
पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने देवी सती के जले हुए शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव किया, तो उनके शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ बन गए।
उज्जैन में देवी सती की कोहनी गिरी थी, और यहाँ माँ हरसिद्धि प्रकट हुईं।
एक अन्य कथा के अनुसार, चंड-मुंड नामक असुरों से देवताओं को मुक्ति दिलाने के लिए माँ दुर्गा ने माँ हरसिद्धि का रूप धारण किया। उन्होंने इन राक्षसों का वध किया और देवताओं की प्रार्थना पर उन्हें वरदान दिया कि वे इस स्थान पर सदा पूजित रहेंगी।
चमत्कारिक विशेषताएँ
1. दीप स्तंभ का रहस्य: मंदिर में दो विशाल दीप स्तंभ हैं, जिन पर सैकड़ों दीये जलते हैं। कहा जाता है कि इन दीयों को जलाने से विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
2. चमत्कारी शक्तियाँ: भक्तों का मानना है कि यहाँ सच्चे दिल से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है।
3. रक्त सिंदूर तिलक: यहाँ माँ को रक्त के रंग जैसा सिंदूर चढ़ाया जाता है, जिसे उनके देवी स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
बेहद खास है मंदिर के दो दीप स्तंभ
यूं तो इसकी और भी कई विशेषताएं हैं, लेकिन एक खास बात जो लोगों के आकर्षण का केंद्र है, वो है मंदिर प्रांगण में स्थापित 2 दीप स्तंभ।
ये दीप स्तंभ लगभग 51 फीट ऊंचे हैं। दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं।
मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी।
विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार साल पुराना है। इस दृष्टिकोण से ये दीप स्तंभ लगभग 2 हजार साल से अधिक पुराने हैं।
दीप स्तंभों पर चढ़कर हजारों दीपकों को जलाना सहज नहीं है, लेकिन उज्जैन निवासी जोशी परिवार लगभग 100 साल से इन दीप स्तंभों को रोशन कर रहा है।
दोनों दीप स्तंभों को एक बार जलाने में लगभग 4 किलो रूई की बाती व 60 लीटर तेल लगता है।
समय-समय पर इन दीप स्तंभों की साफ-सफाई भी की जाती है
हरसिद्धि मंदिर के ये दीप स्तंभ श्रृद्धालुओं के सहयोग से जलाए जाते हैं।
इसके लिए हरसिद्धि मंदिर प्रबंध समिति में पहले बुकिंग कराई जाती है।
प्रमुख त्योहारों जैसे- शिवरात्रि, चैत्र व शारदीय नवरात्रि, धनतेरस व दीपावली पर दीप स्तंभ जलाने की बुकिंग तो साल भर पहले ही श्रृद्धालुओं द्वारा करवा दी जाती है।
कई बार श्रृद्धालु की बारी आते-आते महीनों लग जाते हैं।
पहले के समय में चैत्र व शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि तथा प्रमुख त्योहारों पर ही दीप स्तंभ जलाए जाते थे, लेकिन अब रोज दीप स्तंभ जलाए जाते हैं।
हरसिद्धि नाम की कहानी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंड और मुंड नामक दो दैत्यों ने एक बार कैलाश पर कब्जा करने की योजना बनाई.
दोनों जब वहां पहुंचे तब माता पार्वती और भगवान शंकर द्यूत-क्रीड़ा में व्यस्त थे..
चंड और मुंडे ने अंदर घुसने की कोशिश की लेकिन द्वार पर ही शिव के नंदीगण ने उन्हें रोक दिया.
दोनों दैत्यों ने नंदीगण को शस्त्र से घायल कर दिया.
भगवान शिव को जब इसका पता चला तो उन्होंने चंडी देवी का स्मरण किया.
शिव की आज्ञा से देवी ने दोनों दैत्यों का वध कर दिया.
इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि आपने दुष्टों का वध किया है. इसलिए आप हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध होंगी.
कैसे पहुंचे हरसिद्धि माता मंदिर