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छत्तीसगढ़ का निरई माता मंदिर: साल में सिर्फ 5 घंटे दर्शन, जानें क्यों नहीं होती महिलाओं की एंट्री?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Chhattisgarh Nirai Mata Mandir: छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों के बीच कई ऐसे रहस्य दबे हैं, जो विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

इन्ही में से एक है निरई माता का मंदिर

धमतरी जिले से करीब 25 किलोमीटर दूर मोहेरा गांव की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर अपनी अटूट आस्था और कठोर नियमों के लिए जाना जाता है।

स्वयंभू ज्योति का अनोखा रहस्य

इस मंदिर की सबसे बड़ी पहेली यहाँ जलने वाली अखंड ज्योति है।

चैत्र नवरात्रि के दौरान पहाड़ी के ऊपर एक ज्योति प्रज्वलित होती है।

स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि इस ज्योति को जलाने के लिए न तो तेल का इस्तेमाल होता है और न ही घी का।

 Chhattisgarh Nirai Mata Mandir

यह ‘स्वयंभू’ यानी अपने आप प्रकट होने वाली ज्योति मानी जाती है।

विज्ञान की कसौटी पर भले ही यह एक अनसुलझी पहेली हो, लेकिन भक्तों के लिए यह माता का साक्षात चमत्कार है।

साल में सिर्फ 300 मिनट का समय

आमतौर पर मंदिरों के कपाट भक्तों के लिए हमेशा खुले रहते हैं, लेकिन निरई माता के दरबार का नियम बहुत सख्त है।

साल के 365 दिनों में से यह मंदिर केवल एक दिन, वह भी चैत्र नवरात्रि के पहले रविवार को सुबह 4 बजे से सुबह 9 बजे तक (सिर्फ 5 घंटे) के लिए खुलता है।

इन 5 घंटों में हजारों की भीड़ उमड़ती है।

सुबह 9 बजते ही पूजा संपन्न कर कपाट बंद कर दिए जाते हैं, जिसके बाद पूरे साल वहां सन्नाटा पसरा रहता है।

Chhattisgarh Nirai Mata Mandir

महिलाओं का प्रवेश क्यों है वर्जित?

इस मंदिर की सबसे चर्चित बात यह है कि यहाँ महिलाओं का आना पूरी तरह प्रतिबंधित है।

इसके पीछे एक प्राचीन कहानी जुड़ी है। लोक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में निरई माता एक बैगा पुजारी की भक्ति से प्रसन्न थीं और उन्हें खुद भोजन कराती थीं।

जब पुजारी की पत्नी को इस पर संदेह हुआ और उसने सच्चाई जाननी चाही, तो देवी क्रोधित हो गईं।

उन्होंने श्राप स्वरूप यह आदेश दिया कि भविष्य में कोई भी महिला उस स्थान पर कदम नहीं रखेगी।

आज भी यह परंपरा इतनी दृढ़ है कि महिलाएं दूर से ही पहाड़ी को प्रणाम करती हैं।

मान्यता है कि यदि कोई महिला मंदिर परिसर में प्रवेश करे या वहां का प्रसाद खाए, तो अनिष्ट हो सकता है।

Chhattisgarh Nirai Mata Mandir

पुरुषों के लिए भी हैं कड़े नियम

सिर्फ महिलाएं ही नहीं, पुरुषों को भी माता के दर्शन के लिए विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है।

मंदिर परिसर में प्रवेश करने से पहले पुरुषों को अपने कमर की बेल्ट, माथे का तिलक और लाल रंग के कपड़े उतारने पड़ते हैं।

माता को श्रृंगार की वस्तुएं जैसे सिंदूर, कुमकुम या गुलाल नहीं चढ़ाया जाता।

यहाँ केवल नारियल और अगरबत्ती से ही पूजा की जाती है।

आस्था का सैलाब

भले ही रास्ता पथरीला और दुर्गम हो, लेकिन लोगों का विश्वास अडिग है।

चैत्र नवरात्रि के उस विशेष रविवार को पूरा इलाका मेले में तब्दील हो जाता है।

लोगों का मानना है कि जो भक्त नंगे पैर इस कठिन चढ़ाई को पूरा कर माता के चरणों में नारियल अर्पित करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।

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