Chhattisgarh Nirai Mata Mandir: छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों के बीच कई ऐसे रहस्य दबे हैं, जो विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
इन्ही में से एक है निरई माता का मंदिर।
धमतरी जिले से करीब 25 किलोमीटर दूर मोहेरा गांव की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर अपनी अटूट आस्था और कठोर नियमों के लिए जाना जाता है।
स्वयंभू ज्योति का अनोखा रहस्य
इस मंदिर की सबसे बड़ी पहेली यहाँ जलने वाली अखंड ज्योति है।
चैत्र नवरात्रि के दौरान पहाड़ी के ऊपर एक ज्योति प्रज्वलित होती है।
स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि इस ज्योति को जलाने के लिए न तो तेल का इस्तेमाल होता है और न ही घी का।

यह ‘स्वयंभू’ यानी अपने आप प्रकट होने वाली ज्योति मानी जाती है।
विज्ञान की कसौटी पर भले ही यह एक अनसुलझी पहेली हो, लेकिन भक्तों के लिए यह माता का साक्षात चमत्कार है।
साल में सिर्फ 300 मिनट का समय
आमतौर पर मंदिरों के कपाट भक्तों के लिए हमेशा खुले रहते हैं, लेकिन निरई माता के दरबार का नियम बहुत सख्त है।
साल के 365 दिनों में से यह मंदिर केवल एक दिन, वह भी चैत्र नवरात्रि के पहले रविवार को सुबह 4 बजे से सुबह 9 बजे तक (सिर्फ 5 घंटे) के लिए खुलता है।
इन 5 घंटों में हजारों की भीड़ उमड़ती है।
सुबह 9 बजते ही पूजा संपन्न कर कपाट बंद कर दिए जाते हैं, जिसके बाद पूरे साल वहां सन्नाटा पसरा रहता है।

महिलाओं का प्रवेश क्यों है वर्जित?
इस मंदिर की सबसे चर्चित बात यह है कि यहाँ महिलाओं का आना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
इसके पीछे एक प्राचीन कहानी जुड़ी है। लोक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में निरई माता एक बैगा पुजारी की भक्ति से प्रसन्न थीं और उन्हें खुद भोजन कराती थीं।
जब पुजारी की पत्नी को इस पर संदेह हुआ और उसने सच्चाई जाननी चाही, तो देवी क्रोधित हो गईं।
उन्होंने श्राप स्वरूप यह आदेश दिया कि भविष्य में कोई भी महिला उस स्थान पर कदम नहीं रखेगी।
आज भी यह परंपरा इतनी दृढ़ है कि महिलाएं दूर से ही पहाड़ी को प्रणाम करती हैं।
मान्यता है कि यदि कोई महिला मंदिर परिसर में प्रवेश करे या वहां का प्रसाद खाए, तो अनिष्ट हो सकता है।

पुरुषों के लिए भी हैं कड़े नियम
सिर्फ महिलाएं ही नहीं, पुरुषों को भी माता के दर्शन के लिए विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है।
मंदिर परिसर में प्रवेश करने से पहले पुरुषों को अपने कमर की बेल्ट, माथे का तिलक और लाल रंग के कपड़े उतारने पड़ते हैं।
माता को श्रृंगार की वस्तुएं जैसे सिंदूर, कुमकुम या गुलाल नहीं चढ़ाया जाता।
यहाँ केवल नारियल और अगरबत्ती से ही पूजा की जाती है।
आस्था का सैलाब
भले ही रास्ता पथरीला और दुर्गम हो, लेकिन लोगों का विश्वास अडिग है।
चैत्र नवरात्रि के उस विशेष रविवार को पूरा इलाका मेले में तब्दील हो जाता है।
लोगों का मानना है कि जो भक्त नंगे पैर इस कठिन चढ़ाई को पूरा कर माता के चरणों में नारियल अर्पित करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।
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