Basant Panchami Saraswati Puja: भारतीय संस्कृति में ज्ञान, कला, संगीत और बुद्धि को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, और इन सबकी अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती हैं।
हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हम ‘बसंत पंचमी’ के रूप में मनाते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन का महत्व केवल ऋतु परिवर्तन तक ही सीमित क्यों नहीं है?
क्यों इस दिन कलम और किताबों की पूजा की जाती है?
आइए, इस पर्व पौराणिक कथाओं और मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।

सृष्टि की रचना और मां सरस्वती का प्राकट्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांड की रचना की, तो उन्होंने मनुष्यों, जीव-जंतुओं और प्रकृति को तो बनाया, लेकिन उन्हें एक बड़ी कमी महसूस हुई।
चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। पूरी सृष्टि मौन लग रही थी, जैसे किसी गहरे दुख या अंधकार में डूबी हो।
ब्रह्मा जी अपनी इस रचना से संतुष्ट नहीं थे।
उन्होंने सृष्टि में चेतना और स्वर भरने के लिए भगवान विष्णु की अनुमति से अपनी योगशक्ति द्वारा आदिशक्ति का आह्वान किया।

तब उनके मुख से श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, हाथों में वीणा, पुस्तक और माला लिए देवी सरस्वती प्रकट हुईं।
जैसे ही मां सरस्वती ने अपनी वीणा के तारों को छुआ, पूरी सृष्टि में एक दिव्य कंपन हुआ।
हवाओं को सरसराहट मिली, नदियों को कलकल का स्वर मिला और मनुष्यों को वाणी (शब्द) का उपहार मिला।
चूंकि इस दिन सृष्टि को ‘शब्द’ और ‘स्वर’ मिले थे, इसलिए मां सरस्वती को ‘वाग्देवी’ कहा गया और यह दिन उत्सव बन गया।

क्यों होती है बसंत पंचमी को ही पूजा?
अक्सर लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि बसंत पंचमी मां सरस्वती का जन्मदिन है।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यह केवल जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस दिन का प्रतीक है जब ब्रह्मा जी के आग्रह पर देवी ने मनुष्यों को लिखने, पढ़ने और कला की विधाओं से नवाजा था।
बसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ कहा जाता है। इस समय प्रकृति अपने सबसे सुंदर स्वरूप में होती है।
पीली सरसों के फूल धरती को सोने जैसा बना देते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन से ही शिक्षा ग्रहण करना (विद्यारंभ संस्कार) सबसे शुभ माना जाता है।

सर्वप्रथम किसने की मां सरस्वती की पूजा?
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, मां सरस्वती की सबसे पहली पूजा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने की थी।
कथा के अनुसार, जब सरस्वती जी प्रकट हुईं, तो उनकी महिमा को देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए।
उन्होंने देवी को वरदान दिया कि प्रत्येक कल्प में माघ मास की शुक्ल पंचमी के दिन पूरे ब्रह्मांड के मनुष्य, देवता, मुनि, गंधर्व और नाग अत्यंत श्रद्धा के साथ तुम्हारी पूजा करेंगे।
श्रीकृष्ण के इस वरदान के बाद ही ‘सरस्वती पूजा’ की परंपरा स्थापित हुई।
भगवान कृष्ण ने यह भी कहा था कि जो व्यक्ति इस दिन निष्ठापूर्वक मां शारदे की आराधना करेगा, वह अज्ञानी होने के बावजूद ज्ञान के शिखर तक पहुंचेगा।

ज्ञान की शक्ति: व्यास से वाल्मीकि तक
कहा जाता है कि जब महर्षि व्यास ने रामायण के रचयिता वाल्मीकि जी से पुराणों के गहन सूत्रों के बारे में पूछा, तो वे निरुत्तर हो गए।
तब व्यास जी ने मां भगवती सरस्वती की कठिन तपस्या की।
उनकी कृपा से ही उन्हें वह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई जिससे उन्होंने वेदों का वर्गीकरण किया और 18 पुराणों की रचना कर डाली।
इसी प्रकार, असुरों के गुरु शुक्राचार्य भी मां सरस्वती के आशीर्वाद से ही नीति और शास्त्र के ज्ञाता बने।
यह इस बात का प्रमाण है कि विद्या केवल शब्द सीखने का नाम नहीं है, बल्कि व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का आधार है।

छात्रों के लिए बसंत पंचमी का विशेष महत्व
विद्यार्थियों के लिए यह दिन किसी वरदान से कम नहीं है।
इस दिन छात्र अपनी पुस्तकों, कलम (पेन) और वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं।
मान्यता है कि इस दिन पीले वस्त्र पहनने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।
पीला रंग शुद्धता, नई ऊर्जा और प्रकाश का प्रतीक है।
छात्र इस दिन मां सरस्वती के समक्ष संकल्प लेते हैं कि वे अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेंगे।


