Sheetala Ashtami Katha: सनातन धर्म में त्योहारों का संबंध न केवल देवताओं से है, बल्कि वे हमारे बदलते मौसम और स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़े हैं।
होली के ठीक आठ दिन बाद चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला अष्टमी मनाई जाती है, जिसे लोक भाषा में ‘बसौड़ा’ भी कहते हैं।
इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है और उन्हें बासी भोजन का भोग लगाया जाता है।
आइए जानते हैं कौन है शीतला माता और इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा…
कौन है शीतला माता
शीतला माता देवी पार्वती का ही स्वरूप हैं जिन्हें, शीतलता और रोग नाशिनी देवी के रूप में पूजा जाता है।
उनका स्वरूप अत्यंत सौम्य होता है, वे गधे की सवारी करती हैं और उनके हाथों में कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते होते हैं।

स्कंद पुराण में शीतला माता का उल्लेख मिलता है।
मान्यता है कि उनकी पूजा करने से चेचक, फोड़े-फुंसी, महामारी और गर्मी से संबंधित रोगों से बचाव होता है।
पौराणिक कथा
प्राचीन काल की एक कथा के अनुसार, प्रताप नगर नामक एक गांव में माता शीतला की पूजा का आयोजन हो रहा था।
श्रद्धावश ग्रामीणों ने माता को गरम-गरम नैवेद्य (भोग) अर्पित कर दिया।
गरम भोजन से माता का मुंह जल गया और वे क्रोधित हो गईं।
माता के कोप से पूरे गांव में भीषण आग लग गई।
पूरा गांव जल रहा था, लेकिन एक निर्धन बुढ़िया का घर सुरक्षित था।
जब लोगों ने उससे इसका रहस्य पूछा, तो उसने बताया कि उसने माता को एक दिन पहले का बना ठंडा और शीतल भोजन अर्पित किया था, जिससे माता प्रसन्न हुईं।
अपनी गलती का अहसास होने पर ग्रामीणों ने माता से क्षमा मांगी और संकल्प लिया कि हर साल इस दिन वे चूल्हा नहीं जलाएंगे और माता को केवल शीतल भोजन का ही भोग लगाएंगे।
तभी से यह परंपरा ‘बसौड़ा’ के रूप में प्रसिद्ध हुई।

शीतला अष्टमी व्रत का महत्व
शीतला माता की पूजा से आरोग्य का वरदान मिलता है।
ऐसा कहा जाता है कि यह व्रत करने से माता की कृपा प्राप्त होती है और बच्चों को शीत जनित रोग नहीं सताते।
ये व्रत अच्छी सेहत की कामना के लिए रखा जाता है और माता से रोग-दोष से मुक्ति की कामना की जाती है।
वैज्ञानिक और आयुर्वेद का दृष्टिकोण
शीतला अष्टमी का समय वह होता है जब ऋतु परिवर्तन (सर्दियों की विदाई और गर्मियों का आगमन) अपने चरम पर होता है।
आयुर्वेद के अनुसार, इस बदलते मौसम में शरीर में पित्त और गर्मी बढ़ने की संभावना रहती है।

इस दिन ठंडा भोजन करने से शरीर की आंतरिक गर्मी शांत होती है।
‘बसौड़ा’ का अर्थ ही है कि अब से गर्म और गरिष्ठ भोजन का त्याग कर हल्का और शीतल भोजन शुरू कर देना चाहिए ताकि संक्रामक बीमारियों से बचा जा सके।
पूजा विधि: कैसे करें माता को प्रसन्न?
- पूर्व तैयारी (सप्तमी को): अष्टमी से एक दिन पहले यानी सप्तमी की रात को ही पकवान तैयार कर लिए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से मीठे चावल (ओलिया), पूड़ी, हलवा, रबड़ी और बाजरे की रोटी बनाई जाती है।
- ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर शीतल जल से स्नान करें।
- कलश स्थापना व पूजन: माता की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं (घी का दीपक नहीं जलाया जाता, कहीं-कहीं केवल ठंडी पूजा का विधान है)। माता को जल, रोली, अक्षत, कुमकुम और लाल फूल चढ़ाएं।
- भोग: एक दिन पहले बनाए गए बासी भोजन का भोग लगाएं।
- नीम का महत्व: पूजा के बाद नीम के पत्तों का दर्शन करें और जल का छिड़काव पूरे घर में करें।

किन्हें करनी चाहिए यह पूजा?
- बीमारियों से मुक्ति के लिए- विशेष रूप से चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी और अन्य संक्रामक रोगों से बचाव के लिए माता शीतला की आराधना की जाती है।
- परिवार की सुख-समृद्धि के लिए: गृहस्थी में सुख-शांति और समृद्धि के लिए यह व्रत रखा जाता है।
- जो पहले चेचक या त्वचा रोगों से पीड़ित रहे हों: माता शीतला को प्रसन्न करने से रोगों की पुनरावृत्ति नहीं होती।
- जिनके घर में छोटे बच्चे हों: बच्चों को रोगों से बचाने और उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह व्रत विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
- जो परंपरागत रूप से इस व्रत का पालन करते आए हैं: कई परिवारों में यह पूजा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही होती है, इसलिए इसे जारी रखना शुभ माना जाता है।
- संतान सुख की इच्छा रखने वाले: माता शीतला की पूजा करने से संतान की दीर्घायु और स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

शीतला अष्टमी पर क्या ‘न’ करें? (सावधानियां)
इस दिन कुछ कार्यों की सख्त मनाही होती है, जिनका पालन न करने पर व्रत खंडित माना जाता है:
- चूल्हा न जलाएं: इस दिन घर में आग जलाना वर्जित है। चाय भी थर्मस में पहले से भरकर रखी जाती है।
- ताजा भोजन का त्याग: न ताजा खाना बनाएं और न ही गर्म खाना खाएं।
- सफाई और सुई-धागा: इस दिन झाड़ू लगाना (पूजा के अलावा), सिलाई-कढ़ाई करना या सुई का इस्तेमाल करना अशुभ माना जाता है।
- बाल धोना: महिलाएं इस दिन स्नान तो करती हैं, लेकिन बाल नहीं धोतीं।
- पेड़-पौधों को जल: मान्यताओं के अनुसार इस दिन पौधों की सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

शीतला अष्टमी का पर्व हमें अनुशासन, स्वच्छता और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना सिखाता है।
यह मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों द्वारा बनाया गया एक स्वास्थ्य चक्र है।
माता शीतला की कृपा से आपके परिवार में शीतलता और आरोग्य बना रहे, यही इस पर्व की मूल भावना है।
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