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अरावली पर्वत से जुड़ा है दिल्ली-NCR का भविष्य: इसके बिना कैसे बचेगी राजधानी?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Aravalli mountains danger: दिल्ली-एनसीआर के लिए जीवनदायिनी अरावली पर्वतमाला गंभीर खतरे में है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा “अरावली” की एक नई परिभाषा ने इसके 90% हिस्से को कानूनी सुरक्षा से वंचित कर दिया है।

इस निर्णय के चलते वे पहाड़ियाँ, जो अब तक संरक्षित थीं, अब खनन और निर्माण की भेंट चढ़ सकती हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर अरावली का अस्तित्व खत्म हुआ तो दिल्ली क्षेत्र में जल संकट, भीषण वायु प्रदूषण और असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ेगा।

नई परिभाषा ने क्यों बढ़ाई चिंता?

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि केवल वही पहाड़ियाँ “अरावली” मानी जाएँगी जो स्थानीय धरातल से 100 मीटर या अधिक ऊँची हों।

समस्या यह है कि अरावली की लगभग 90% पहाड़ियाँ इस ऊँचाई से कम हैं।

इसका सीधा मतलब है कि इन विशाल हरित क्षेत्रों पर अब कानूनी संरक्षण हट सकता है।

पर्यावरणविदों और स्थानीय नेताओं ने इस पर गहरी चिंता और आक्रोश जताया है।

उनका मानना है कि यह कदम पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विनाशकारी साबित होगा।

अरावली नहीं तो क्या होगा दिल्ली-एनसीआर का?

अरावली के बिना दिल्ली-एनसीआर के जीवन पर पड़ने वाले प्रमुख प्रभाव इस प्रकार होंगे:

सांस लेना भी होगा मुश्किल:

दिल्ली का अपना कोई प्राकृतिक जंगल नहीं है। 1.5 बिलियन वर्ष पुरानी यह पर्वत श्रृंखला शहर के “फेफड़ों” का काम करती है।

यहाँ के पेड़-पौधे प्रदूषण को सोखते हैं और ऑक्सीजन देते हैं।

अगर यह हरियाली नष्ट हुई, तो वायु प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ जाएगा कि साफ हवा में सांस लेना एक सपना बनकर रह जाएगा।

थार का रेगिस्तान दिल्ली तक आ जाएगा:

अरावली राजस्थान से आने वाली गर्म, धूल-भरी हवाओं और रेतीले तूफानों के आगे एक दीवार की तरह खड़ी है।

यदि यह प्राकृतिक अवरोध कमजोर पड़ा, तो दिल्ली-एनसीआर सीधे थार के रेगिस्तान की मार झेलेगा।

धूल भरी आँधियाँ और लू का प्रकोप आम बात हो जाएगी।

गहराएगा जल संकट:

अरावली की पहाड़ियाँ बारिश के पानी को संग्रहित करने में अहम भूमिका निभाती हैं।

यह भूजल स्तर को रिचार्ज करती हैं।

अगर इन पर कंक्रीट के जंगल बस गए, तो पानी जमीन में नहीं समाएगा और बहकर चला जाएगा।

बाढ़ का खतरा

इससे एक तरफ तो भूजल स्तर और गिरेगा, वहीं दूसरी ओर शहरी इलाकों में बाढ़ की आशंका भी बढ़ जाएगी।

आगे क्या होगा

यह मुद्दा केवल पेड़-पहाड़ों का नहीं, बल्कि राजधानी क्षेत्र के करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य, जल सुरक्षा और रहने योग्य पर्यावरण का है।

विशेषज्ञों की मांग है कि अरावली की परिभाषा को व्यापक और वैज्ञानिक आधार पर देखना चाहिए।

साथ ही, मौजूदा हरित आवरण को किसी भी हाल में बचाने के लिए सख्त नीतियाँ बनाने और उन पर अमल करने की जरूरत है।

सार्वजनिक जागरूकता और सामूहिक कार्रवाई ही इस प्राकृतिक विरासत को बचा सकती है, वरना दिल्ली-एनसीआर के सामने भविष्य में भीषण पर्यावरणीय संकट खड़ा होना तय है।

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