Avimukteshwaranand Leaves Magh Mela: ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रयागराज के माघ मेले को अचानक छोड़ दिया है।
28 जनवरी, बुधवार सुबह वो काशी के लिए रवाना हो गए।
उन्होंने कहा कि उनका मन इतना दुखी है कि वह बिना स्नान किए ही प्रयागराज से जा रहे हैं।
उन्होंने प्रशासन पर माघ मेले में अपने और शिष्यों के अपमान का आरोप लगाया और कहा कि जब तक दोषी माफी नहीं मांगते, वह स्नान नहीं करेंगे।

‘युवाओं को दिखानी होगी औकात’
प्रयागराज से जाते समय शंकराचार्य ने युवाओं से अपील करते हुए कहा,
“जिन्होंने सनातनी प्रतीकों का अपमान किया है, उन्हें उनकी औकात दिखानी होगी। अगर सनातनी चाहेंगे, तो हम शांत नहीं बैठेंगे। इस अन्याय के प्रतिकार के लिए आगे भी आंदोलन किया जाएगा।”
उन्होंने कहा कि वह पीछे सत्य की गूंज और कई सवाल छोड़कर जा रहे हैं, जो पूरे विश्व में गूंजेंगे।
VIDEO | Prayagraj: Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand leaves Magh Mela without taking a holy dip after confrontation with the administration.
He says, “I never imagined will have to leave the mela with such a heavy heart.”
(Full video available on PTI Videos -… pic.twitter.com/AwSJwpmHby
— Press Trust of India (@PTI_News) January 28, 2026
माघ मेले के बाकी स्नानों में नहीं लेंगे हिस्सा
माघ मेला 15 फरवरी तक चलेगा और अभी दो मुख्य स्नान बाकी हैं- माघी पूर्णिमा (1 फरवरी) और महाशिवरात्रि (15 फरवरी)।
शंकराचार्य के मेला छोड़ने के फैसले का मतलब है कि वह इन दोनों स्नानों में भी शामिल नहीं होंगे।
विवाद की वजह से उन्होंने मेला 18 दिन पहले ही छोड़ दिया है।
उनके जाने के बाद उनके शिविर को हटाने का काम शुरू हो गया है।

कहा- ‘दिखावे का सम्मान नहीं चाहिए’
शंकराचार्य ने बताया कि मंगलवार को प्रशासन की ओर से उन्हें एक पत्र भेजा गया था।
इसमें कहा गया था कि उन्हें पूरे सम्मान के साथ पालकी से संगम ले जाकर स्नान कराया जाएगा।
लेकिन शंकराचार्य ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
उन्होंने कहा, “जब दिल में दुख और गुस्सा हो, तो पवित्र पानी भी शांति नहीं दे पाता। असली सम्मान तब होता है जब गलती मानकर सच्चे मन से माफी मांगी जाए। प्रस्ताव में माफी नहीं मांगी गई। अगर मैं प्रस्ताव मान लेता, तो मेरे और भक्तों के अपमान का मुद्दा दब जाता।”

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
पूरा मामला 18 जनवरी, मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ।
शंकराचार्य स्नान के लिए पालकी में जा रहे थे, तभी पुलिस ने उनकी पालकी रोक दी। इस पर विवाद हो गया।
शंकराचार्य के शिष्यों का आरोप है कि पुलिस ने उनके साथ धक्का-मुक्की की, शिखा पकड़कर घसीटा और अपमान किया।
This is the True Face of these “so called” thekedars of Hinduism
In Prayagraj, during the Magh Mela, police and officials stopped the procession of Jagadguru Shankaracharya Avimukteshwaranand and beat and pushed around elderly saints and young boys reciting Vedic hymns. The… pic.twitter.com/bXKrQNk22U
— Harmeet Kaur K (@iamharmeetK) January 18, 2026
इस घटना के बाद शंकराचार्य ने अपने शिविर के बाहर ही धरना शुरू कर दिया और 11 दिन तक शिविर के अंदर नहीं गए।
इस दौरान प्रशासन ने उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा, जिसका उन्होंने जवाब दिया।
सीएम योगी पर भी साधा निशाना
विवाद तब और बढ़ गया जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए ‘कालनेमि’ शब्द का इस्तेमाल किया।
जवाब में शंकराचार्य ने सीएम योगी की तुलना कालनेमि और मुगल बादशाह औरंगजेब से कर दी।
उन्होंने कहा, “जो मुगलों के समय हुआ था, वही आज हो रहा है। इन 11 दिनों में हमारी प्रतिष्ठा की हत्या का प्रयास हुआ। अगर यह स्थानीय प्रशासन करता तो बात अलग थी, लेकिन इसके पीछे यूपी सरकार है।”
संत समाज दो हिस्सों में बंटे
इस विवाद ने संत समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है।
समर्थन में: द्वारका पीठ के शंकराचार्य सदानंद महाराज और पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद का साथ दिया। उनका कहना है कि यह सत्ता का अहंकार है।

विरोध में: चित्रकूट के जगद्गुरु रामभद्राचार्य और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष खींद्र पुरी ने कहा कि संगम तक पालकी ले जाने का कोई नियम नहीं है और शंकराचार्य को अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए था।
मानवाधिकार आयोग पहुंचा मामला
मारपीट के मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील डॉ. गजेंद्र सिंह यादव ने राज्य मानवाधिकार आयोग में शिकायत की है।
शिकायत में कहा गया है कि मेला प्रशासन और पुलिस ने शंकराचार्य के धार्मिक काफिले को रोका, जबकि अन्य संतों और अखाड़ों को स्नान की अनुमति दी गई।
यह भेदभावपूर्ण है। शिकायत में निष्पक्ष जांच और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।

शंकराचार्य के इस कदम से माघ मेले में एक बड़ी राजनीतिक और धार्मिक बहस शुरू हो गई है।
उनके समर्थक इसे सनातन परंपरा और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं, जबकि प्रशासन का पक्ष अभी स्पष्ट नहीं है।
अब देखना है कि यह विवाद आगे किस रूप में सामने आता है और सनातनी समाज इसका क्या जवाब देता है।
मामले से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें-



