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अब 10 मिनट में डिलीवरी का वादा खत्म: सरकार की सख्ती के बाद क्विक कॉमर्स कंपनियों का बड़ा फैसला

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 13 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

10 minute delivery banned: भारत में पिछले कुछ सालों से ’10 मिनट डिलीवरी’ का क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा था।

चाय की पत्ती खत्म हो या ऑफिस के लिए तैयार होते समय ब्रेड, क्विक कॉमर्स ऐप्स ने दावा किया था कि वे आपकी जरूरत को पलक झपकते ही पूरा कर देंगे।

लेकिन अब इस ‘सुपरफास्ट’ मॉडल पर ब्रेक लग गया है।

भारत सरकार की सख्ती और डिलीवरी पार्टनर्स की सुरक्षा को लेकर उठते सवालों के बीच, ब्लिंकिट (Blinkit) सहित अन्य प्रमुख कंपनियों ने अपने विज्ञापनों और ब्रांडिंग से ’10 मिनट डिलीवरी’ का दावा हटाने का निर्णय लिया है।

सरकार का हस्तक्षेप और श्रम मंत्रालय की बैठक

इस बड़े बदलाव की नींव केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया की क्विक कॉमर्स कंपनियों के साथ हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में रखी गई।

इस बैठक में ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी और जोमैटो के शीर्ष अधिकारी शामिल थे।

सरकार का स्पष्ट रुख था कि बिजनेस मॉडल कितना भी आधुनिक क्यों न हो, उसे किसी की जान की कीमत पर नहीं चलाया जा सकता।

मंत्री मांडविया ने चिंता जताई कि 10 मिनट की समय सीमा का दबाव डिलीवरी राइडर्स को ट्रैफिक नियमों को तोड़ने, लाल बत्ती जंप करने और तेज गाड़ी चलाने के लिए मजबूर करता है।

इससे न केवल राइडर्स की जान को खतरा होता है, बल्कि सड़कों पर चलने वाले आम नागरिकों के लिए भी दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है।

ब्लिंकिट ने की शुरुआत, अन्य कंपनियां भी कतार में

सरकार के इस निर्देश का असर दिखने लगा है।

ब्लिंकिट ने अपने ऐप इंटरफेस, लोगो और सोशल मीडिया हैंडल से ’10 मिनट’ का टैग हटा दिया है।

बैठक के दौरान स्विगी, जोमैटो और जेप्टो ने भी आश्वासन दिया है कि वे जल्द ही अपनी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में बदलाव करेंगे और ग्राहकों से किसी भी फिक्स्ड समय सीमा का वादा नहीं करेंगे।

अब ये कंपनियां ‘फास्ट डिलीवरी’ की बात तो करेंगी, लेकिन 10 या 15 मिनट जैसी कोई कठोर शर्त नहीं रखेंगी।

राज्यसभा में भी गूंजा गिग वर्कर्स का मुद्दा

इस फैसले के पीछे केवल सरकारी दबाव ही नहीं, बल्कि लाखों गिग वर्कर्स (Gig Workers) का आक्रोश भी शामिल है।

31 दिसंबर को जब पूरा देश जश्न की तैयारी कर रहा था, तब देशभर के करीब 2 लाख डिलीवरी राइडर्स ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल की थी।

उनकी प्रमुख मांग ’10 मिनट डिलीवरी’ मॉडल को खत्म करना और काम के सुरक्षित माहौल को सुनिश्चित करना था।

इसके अलावा, राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भी संसद में डिलीवरी बॉयज की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था, जिससे यह मामला राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया।

क्या है क्विक कॉमर्स मॉडल और क्यों बढ़ी इसकी लोकप्रियता?

क्विक कॉमर्स (Q-Commerce) का उदय मुख्य रूप से कोरोना महामारी के दौरान हुआ।

जब लोग घरों में कैद थे, तब कम समय में सामान पहुंचाने की सुविधा ने इसे घर-घर पहुंचा दिया।

यह मॉडल ‘डार्क स्टोर्स’ (छोटे गोदामों) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित है।

ये स्टोर रिहायशी इलाकों के बहुत करीब होते हैं, जिससे सामान जल्दी डिलीवर हो पाता है।

हालांकि, डिलीवरी का अंतिम चरण (Last Mile Delivery) हमेशा राइडर की मेहनत और रिस्क पर टिका रहता है।

मार्केटिंग और ऑपरेशन पर क्या होगा असर?

अब तक ’10 मिनट’ इन कंपनियों की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) थी। विज्ञापन इसी दावे पर टिके थे।

अब कंपनियों को अपनी मार्केटिंग रणनीति पूरी तरह बदलनी होगी।

हालांकि, कंपनियों का कहना है कि वे अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी कम नहीं करेंगी।

उनके डार्क स्टोर और लॉजिस्टिक्स पहले की तरह ही काम करेंगे, लेकिन वे ग्राहकों के मन में समय को लेकर ऐसी उम्मीद नहीं जगाना चाहते जिससे राइडर पर मानसिक या शारीरिक दबाव बने।

सुरक्षा और तकनीक का संतुलन

भारत में गिग इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है। नीति आयोग के अनुसार, 2030 तक इस क्षेत्र में करोड़ों लोग जुड़ेंगे।

ऐसे में सरकार का यह कदम एक स्वागत योग्य पहल है।

यह फैसला संदेश देता है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में सुविधा महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन की सुरक्षा उससे कहीं ऊपर है।

अब ‘सुपरफास्ट’ की जगह ‘सेफ और फास्ट’ डिलीवरी का नया दौर शुरू होने जा रहा है।

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