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BMC Election Results ने पलटी महाराष्ट्र की राजनीति, जानें उद्धव और राज ठाकरे की हार के 5 कारण

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

BMC Election Results 2026: महाराष्ट्र की राजनीति में शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया।

इसे केवल एक नगर निगम चुनाव के नतीजों के तौर पर नहीं, बल्कि एक ‘युग के अंत’ के रूप में देखा जा रहा है।

एशिया की सबसे अमीर नगर पालिका, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर पिछले तीन दशकों से चला आ रहा ठाकरे परिवार का एकछत्र राज अब समाप्त हो गया है।

2026 के इन निकाय चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल ‘ठाकरे’ उपनाम या ‘मराठी मानुस’ के नाम पर भावनाएं भड़काकर चुनाव नहीं जीते जा सकते।

बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति ने न केवल मुंबई, बल्कि पुणे, नागपुर और नासिक जैसे बड़े गढ़ों में भी विपक्ष का सफाया कर दिया है।

BJP की आंधी और विपक्ष की तबाही

2026 के निकाय चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।

कुल 29 नगर निगमों में से 23 पर बीजेपी गठबंधन आगे चल रहा है।

बीएमसी चुनाव में 227 में से 208 सीटों के रुझान सामने आए हैं।

शुरुआती रुझानों में BJP गठबंधन 118 सीटों पर आगे, शिवसेना UBT 70 और कांग्रेस 12 सीट और अन्य 5 सीटों पर आगे है।

दूसरी तरफ, पहली बार एक साथ चुनावी मैदान में उतरे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी को मुंबई की जनता ने सिरे से खारिज कर दिया।

ठाकरे गठबंधन महज 72 सीटों पर सिमट गया।

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राज ठाकरे की पार्टी मनसे (MNS) की स्थिति तो और भी दयनीय रही।

पूरी मुंबई में उनकी पार्टी दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई और राज्य के 22 शहरों में तो उनका खाता तक नहीं खुल सका।

20 साल बाद साथ आए भाई, फिर क्यों हुई ‘दुर्गति’?

सियासी गलियारों में चर्चा थी कि अगर उद्धव और राज ठाकरे एक हो जाएं, तो वे मराठी वोटों के बिखराव को रोककर बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं।

लेकिन जमीन पर यह समीकरण उल्टा पड़ गया। राज ठाकरे को साथ लेना उद्धव ठाकरे के लिए एक ‘रणनीतिक भूल’ साबित हुआ। इसके पीछे ये 5 कारण माने जा रहे हैं:

1. ‘मराठी मानुस’ एजेंडे की एक्सपायरी डेट

राज ठाकरे ने जब शिवसेना से अलग होकर मनसे बनाई थी, तब उन्होंने ‘पुत्र और उत्तराधिकारी’ वाली छवि से इतर अपनी एक आक्रामक पहचान बनाई थी।

लेकिन बीते सालों में उनका रुख कभी कट्टर मराठी, कभी हिंदुत्व, तो कभी बीजेपी के समर्थन की ओर डोलता रहा।

मतदाता को यह समझ ही नहीं आया कि राज ठाकरे असल में किसके साथ हैं।

वहीं, ‘मराठी मानुस’ का मुद्दा अब केवल भावनात्मक रह गया है, जबकि आज का युवा वोटर विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार की बात करता है।

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2. उत्तर भारतीय और अल्पसंख्यक वोटों का मोहभंग

उद्धव ठाकरे ने इस चुनाव में कांग्रेस का हाथ छोड़कर अपने चचेरे भाई राज ठाकरे का साथ चुना।

यह फैसला उनके लिए आत्मघाती रहा। राज ठाकरे की छवि हमेशा से उत्तर भारतीयों के विरोधी की रही है।

मुंबई की आबादी में उत्तर भारतीय और अन्य राज्यों के लोग करीब 30-35% हैं।

जैसे ही उद्धव ने राज से हाथ मिलाया, उत्तर भारतीय वोटर पूरी तरह से बीजेपी और शिंदे गुट की ओर शिफ्ट हो गए।

साथ ही, कांग्रेस का साथ छोड़ने से अल्पसंख्यक (मुस्लिम) वोट बैंक भी छिटक गया, जो पिछले विधानसभा चुनाव में उद्धव के साथ खड़ा था।

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3. संगठन का बिखराव, असली-नकली की लड़ाई

2022 में शिवसेना में हुई टूट ने ठाकरे परिवार की जड़ें हिला दी थीं।

चुनाव आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे को ‘असली शिवसेना’ और ‘धनुष-बाण’ का चुनाव चिह्न दिए जाने के बाद जनता के बीच एक संदेश गया कि सत्ता और संगठन अब शिंदे के पास है।

उद्धव ठाकरे के पास कार्यकर्ताओं की कमी हो गई, और जो बचे थे, वे राज ठाकरे की मनसे के साथ तालमेल नहीं बैठा पाए।

4. जनता से कटता संपर्क और ‘ब्रांड ठाकरे’ का पतन

एक समय था जब मातोश्री (ठाकरे निवास) से निकला एक आदेश पूरी मुंबई को रोक देता था। लेकिन अब समय बदल गया है।

बीजेपी और शिंदे सेना के नेताओं ने आरोप लगाया कि उद्धव ठाकरे ‘वर्क फ्रॉम होम’ और ‘फेसबुक लाइव’ तक सीमित रह गए, जबकि उनके विधायक और कार्यकर्ता आम जनता से दूर होते गए।

नई पीढ़ी (18-25 आयु वर्ग) के लिए ‘ठाकरे’ शब्द में अब वह आकर्षण नहीं रहा जो 90 के दशक में हुआ करता था।

वे मोदी के विकास मॉडल और शिंदे की जमीनी कार्यशैली से अधिक प्रभावित दिखे।

5. बीजेपी की माइक्रो-प्लानिंग और शिंदे का ‘मराठी कार्ड’

बीजेपी ने बीएमसी चुनाव को किसी विधानसभा या लोकसभा चुनाव की तरह लड़ा।

उन्होंने केवल गुजराती या दक्षिण भारतीय वोटों पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि एकनाथ शिंदे के जरिए ‘मराठी मानुस’ के वोट बैंक में भी सेंध लगा दी।

शिंदे ने खुद को एक ‘काम करने वाला मराठी मुख्यमंत्री’ पेश किया, जिससे ठाकरे बंधुओं का यह दावा कमजोर पड़ गया कि केवल वे ही मराठियों के रक्षक हैं।

क्या यह ‘गेम ओवर’ है?

2026 के ये नतीजे संकेत दे रहे हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति अब ‘परिवारवाद’ और ‘प्रादेशिक अस्मिता’ के पुराने ढर्रे से बाहर निकलकर ‘परफार्मेंस’ की ओर बढ़ रही है।

राज ठाकरे का 22 शहरों में शून्य पर सिमटना और बीएमसी में बीजेपी का पूर्ण बहुमत मिलना यह बताता है कि अब जनता को कोरे वादे नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहिए।

अगर ठाकरे बंधुओं ने अपनी रणनीति और जनता से जुड़ाव के तरीके नहीं बदले, तो आने वाले समय में उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता पर बड़ा सवालिया निशान लग सकता है।

फिलहाल, मुंबई का ‘नया बॉस’ बीजेपी बन चुकी है।

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