Bitchat App in CJP Protest: NEET पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP का विरोध प्रदर्शन जारी है।
छात्रों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है।
इस विरोध प्रदर्शन के बीच एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इंटरनेट प्रतिबंध और मोबाइल नेटवर्क के ठप्प होने के बावजूद भी छात्र कैसे एक-दूसरे तक मैसेज भेज रहे हैं?
दरअसल, सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जब किसी संवेदनशील इलाके में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया जाता है या नेटवर्क ठप हो जाता है, तब लोगों के लिए एक-दूसरे से संपर्क करना नामुमकिन जैसा हो जाता है।
लेकिन इस प्रदर्शन के दौरान एक हैरान करने वाली बात सामने आई—प्रदर्शनकारी इंटरनेट न होने के बावजूद आपस में मैसेज का आदान-प्रदान कर रहे थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली पुलिस अब इस बात की गहन जांच कर रही है कि क्या प्रदर्शनकारियों ने इंटरनेट बैन से निपटने के लिए किसी खास ‘ऑफलाइन मैसेजिंग ऐप’ का इस्तेमाल किया है।
बिना इंटरनेट मैसेज कैसे संभव है?
आम तौर पर जब हम WhatsApp, Telegram या Signal जैसे ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं, तो हमारे मैसेज पहले हमारे फोन से मोबाइल डेटा या वाई-फाई के जरिए किसी केंद्रीय सर्वर (Central Server) पर जाते हैं और फिर वहां से सामने वाले के फोन तक पहुंचते हैं।
इसके लिए सिम कार्ड, 4G/5G नेटवर्क या वाई-फाई का होना बेहद जरूरी है।
लेकिन ऑफलाइन मैसेजिंग ऐप्स पूरी तरह से अलग सिद्धांत पर काम करते हैं।
ये ऐप्स आपके स्मार्टफोन में पहले से मौजूद ब्लूटूथ लो एनर्जी (Bluetooth Low Energy – BLE) टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए:
- न तो इंटरनेट डेटा की जरूरत होती है।
- न ही किसी सिम कार्ड या मोबाइल टावर की आवश्यकता होती है।
- यूजर को कोई फोन नंबर डालने या अकाउंट बनाने की भी जरूरत नहीं पड़ती।

क्या है मेश नेटवर्क (Mesh Network) और कैसे काम करता है?
इन ऐप्स के काम करने के तरीके को ‘मेश नेटवर्किंग’ (Mesh Networking) कहा जाता है। इसे आसान शब्दों में ऐसे समझें:
* डायरेक्ट कनेक्शन: जब आप ऐप से कोई मैसेज भेजते हैं, तो वह इंटरनेट पर जाने के बजाय आपके ब्लूटूथ की रेंज (लगभग 10 से 100 मीटर) में मौजूद दूसरे फोन की तलाश करता है।
* मैसेज हॉपिंग (उछलकर जाना): मान लीजिए आप ‘व्यक्ति A’ हैं और आपको दूर खड़े ‘व्यक्ति C’ को मैसेज भेजना है, जो आपकी ब्लूटूथ रेंज से बाहर है। अगर आपके और C के बीच में ‘व्यक्ति B’ खड़ा है (जिसके फोन में भी वही ऐप है), तो आपका मैसेज A से B के फोन में जाएगा और B के फोन से री-ट्रांसमिट (Re-transmit) होकर C तक पहुंच जाएगा।
* चेन रिएक्शन: इसी तरह मैसेज एक फोन से दूसरे फोन पर ‘उछलते’ हुए (Hops) अपनी अंतिम मंजिल तक पहुंच जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में बीच वाले यूजर (व्यक्ति B) को पता भी नहीं चलता कि उसके फोन के जरिए कोई मैसेज आगे पास हुआ है, क्योंकि सारा डेटा एनक्रिप्टेड (Encrypted) रहता है।

जितनी ज्यादा भीड़, उतना मजबूत नेटवर्क
सामान्य मोबाइल नेटवर्क की खासियत यह होती है कि भीड़ बढ़ने पर टावर ओवरलोड हो जाते हैं और इंटरनेट धीमा पड़ जाता है।
लेकिन मेश नेटवर्क टेक्नोलॉजी के साथ मामला बिल्कुल उल्टा है!
* ज्यादा यूजर = बड़ा नेटवर्क: जितने ज्यादा लोग एक जगह मौजूद होंगे और इस ऐप का इस्तेमाल करेंगे, यह नेटवर्क उतना ही विशाल और मजबूत बनता जाएगा।
* घनी आबादी, स्टेडियम, रैली या प्रदर्शन स्थलों (जैसे जंतर-मंतर) पर यह तकनीक सबसे ज्यादा असरदार साबित होती है क्योंकि वहां हर कुछ मीटर की दूरी पर एक स्मार्टफोन मौजूद होता है।

चर्चा में क्यों आया ‘Bitchat’ ऐप?
खबरों में जैक डॉर्सी (X/ट्विटर के सह-संस्थापक) द्वारा पेश किए गए Bitchat जैसे ऐप्स का नाम सामने आ रहा है।
इस तरह के ऐप्स यूजर्स को बिना कोई व्यक्तिगत जानकारी (जैसे ईमेल या फोन नंबर) दिए लोकल लेवल पर पीयर-टू-पीयर (P2P) मैसेजिंग की सुविधा देते हैं।
प्ले स्टोर पर ऐसे ऐप्स के लाखों डाउनलोड्स मौजूद हैं।

दिल्ली पुलिस की जांच और तकनीक की चुनौतियां
रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली पुलिस यह समझने की कोशिश कर रही है कि क्या जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों ने भीड़ को एक साथ जुटाने या निर्देश देने के लिए इस तकनीक का सहारा लिया था।
पुलिस आईपीडीआर रिकॉर्ड्स, सीसीटीवी फुटेज और अन्य सर्विलांस तकनीकों से स्थिति का विश्लेषण कर रही है।
इस तकनीक की सीमाएं (Limitations):
* सीमित दूरी: यदि दो फोन के बीच में कोई तीसरा फोन मौजूद न हो, तो ब्लूटूथ की रेंज खत्म होते ही मैसेज रुक जाता है।
* बैटरी की खपत: लगातार ब्लूटूथ स्कैनिंग और मेश डेटा ट्रांसमिशन से फोन की बैटरी तेजी से खत्म हो सकती है।

केवल प्रदर्शन नहीं, आपदा प्रबंधन में भी मददगार
यह पहली बार नहीं है जब offline messaging apps की चर्चा हुई है।
इससे पहले हांगकांग, ईरान, यूक्रेन और कई अन्य देशों में बड़े नागरिक प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट ब्लैकआउट से बचने के लिए ऐसे ऐप्स का व्यापक इस्तेमाल देखा गया था।
हालांकि, इस तकनीक का इस्तेमाल केवल प्रदर्शनों तक सीमित नहीं है।

भूकंप, बाढ़ या तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय जब मोबाइल टावर गिर जाते हैं और सेल्युलर नेटवर्क पूरी तरह ठप हो जाता है, तब यह तकनीक राहत और बचाव (Rescue Operations) कार्यों में वरदान साबित होती है।
इसके जरिए फंसे हुए लोग बिना किसी टावर के आसपास के बचाव दल को अपनी लोकेशन या मैसेज भेज सकते हैं।
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