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‘लोन वर्राटू’ की बड़ी जीत: दंतेवाड़ा में 63 नक्सलियों ने किया सरेंडर, 1 करोड़ से अधिक का था इनाम

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 13 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Naxal surrender in Dantewada: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले से एक बड़ी खबर सामने आई है।

राज्य सरकार के ‘लोन वर्राटू’ (घर वापसी) अभियान से प्रभावित होकर 63 नक्सलियों ने एक साथ हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है।

सुरक्षा बलों के सामने सामूहिक रूप से हथियार डालने वाले इन नक्सलियों में 18 महिलाएं भी शामिल हैं।

यह घटना बस्तर संभाग में नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में अब तक की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानी जा रही है।

बड़े चेहरों ने किया सरेंडर

आत्मसमर्पण करने वाले इस समूह में सबसे चौंकाने वाला और महत्वपूर्ण नाम मोहन कड़ती का है।

मोहन, पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का सचिव था और संगठन में उसकी तूती बोलती थी।

उसने अपनी पत्नी के साथ पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सरेंडर करने वाले इन सभी नक्सलियों पर कुल मिलाकर 1 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था।

इतने बड़े स्तर पर नेतृत्व करने वाले नक्सलियों का पीछे हटना, नक्सली संगठन के बुनियादी ढांचे के लिए एक गहरा आघात है।

क्या है ‘लोन वर्राटू’ अभियान?

स्थानीय गोंडी भाषा में ‘लोन वर्राटू’ का अर्थ होता है “घर वापस आइए”

दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य उन भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाना है, जो किसी न किसी कारणवश नक्सली विचारधारा से जुड़ गए थे।

पुलिस गांव-गांव जाकर नक्सलियों के परिवारों से संपर्क करती है और उन्हें विश्वास दिलाती है कि समर्पण करने पर उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान मिलेगा।

रणनीति और सफलता के कारण

इस सामूहिक आत्मसमर्पण के पीछे सुरक्षा बलों की बहुआयामी रणनीति रही है:

  • सघन सर्च ऑपरेशन: जंगलों में लगातार दबाव के कारण नक्सलियों का छिपना मुश्किल हो गया है।
  • पुनर्वास नीति: सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद और रोजगार की गारंटी ने नक्सलियों को सोचने पर मजबूर किया है।
  • विकास का प्रभाव: सुदूर गांवों तक सड़कों और बिजली का पहुंचना नक्सलियों के प्रभाव को कम कर रहा है।

बाहरी राज्यों के नक्सली भी शामिल

हैरानी की बात यह है कि सरेंडर करने वालों में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ से बाहर के राज्यों के नक्सली भी शामिल हैं।

इससे यह साफ होता है कि अब नक्सली आंदोलन के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है और वे समझ चुके हैं कि बंदूक के दम पर बदलाव संभव नहीं है।

आगे की राह

जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सरेंडर करने वाले इन सभी पूर्व-नक्सलियों को सरकार की पुनर्वास योजना का पूरा लाभ दिया जाएगा।

उन्हें तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करने के साथ-साथ कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे मेहनत की कमाई से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें।

अधिकारियों का मानना है कि इस कदम से दंतेवाड़ा के युवाओं में एक सकारात्मक संदेश जाएगा और आने वाले समय में और भी नक्सली हथियार छोड़ सकते हैं।

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