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इंदौर MY हॉस्पिटल चूहा कांड: डीन और अधीक्षक पर लापरवाही के आरोप, हाईकोर्ट में पेश हुई रिपोर्ट

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Indore MY Hospital Rat Scandal: इंदौर के महाराजा यशवंतराव (MY) अस्पताल में चूहों द्वारा दो नवजात बच्चियों की मौत का मामला एक बड़ा स्वास्थ्य घोटाला बनकर उभरा है।

इस घटना की जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश कर दी है, जिसमें अस्पताल प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारियों डीन और अधीक्षक को सीधे तौर पर दोषी ठहराया गया है।

रिपोर्ट में लापरवाही, जानकारी छिपाने और बिना काम कराए करोड़ों रुपए के भुगतान जैसे गंभीर खुलासे हुए हैं।

चूहे के काटने से दो मासूमों की मौत

इंदौर के एमवाय हॉस्पिटल के नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में सितंबर 2025 की एक दुखद घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।

यहां भर्ती दो नवजात बच्चियों को चूहों ने काट लिया, जिसके बाद उनकी मौत हो गई।

यह घटना एक दुर्घटना नहीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही और अव्यवस्था का नतीजा थी।

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इस घटना के बाद हुए हंगामे और न्यायिक हस्तक्षेप के चलते एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया गया।

इस समिति का नेतृत्व आयुष्मान भारत योजना के सीईओ डॉ. योगेश भरसट ने किया।

समिति ने गहन जांच के बाद अपनी रिपोर्ट 8 अक्टूबर, 2025 को इंदौर की हाईकोर्ट खंडपीठ में पेश की।

इस रिपोर्ट ने अस्पताल के शीर्ष अधिकारियों को पूरी तरह से कठघरे में खड़ा कर दिया है।

जांच रिपोर्ट के प्रमुख खुलासे

जांच समिति की रिपोर्ट ने इस मामले के कई चौंकाने वाले खुलासे किए है।

1. डीन और अधीक्षक की सीधी जिम्मेदारी:

रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है कि एमवाय अस्पताल में सफाई, कीट और चूहानाशक (पेस्ट कंट्रोल) की जिम्मेदारी सीधे तौर पर अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अशोक यादव और एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया की थी।

इन्हीं दोनों अधिकारियों पर पेस्ट कंट्रोल की आउटसोर्स कंपनी के काम की निगरानी करने और उसे भुगतान जारी करने की जिम्मेदारी भी थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरी घटना में ये दोनों शीर्ष अधिकारी पूरी तरह से विफल साबित हुए।

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2. जानकारी छिपाने का आरोप:

सबसे गंभीर आरोप यह है कि डीन और अधीक्षक ने जांच समिति के सामने पूरे तथ्य पेश नहीं किए।

समिति ने बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, आउटसोर्स कंपनी ‘एजाइल पेस्ट कंट्रोल’ को किए गए भुगतान से जुड़े दस्तावेज और नोटशीट समिति को उपलब्ध नहीं कराए गए।

यह एक तरह से जानबूझकर जानकारी छिपाने जैसा काम था, जिससे जांच के रास्ते में रोड़े अटकाने की कोशिश की गई।

3. बिना काम कराए करोड़ों का भुगतान:

रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि पेस्ट कंट्रोल कंपनी ‘एजाइल’ को हर महीने 2 करोड़ 20 लाख 46 हजार 415 रुपए का भुगतान किया जा रहा था।

हैरानी की बात यह है कि यह भुगतान बिना किसी सत्यापन के किया जा रहा था।

कंपनी सिर्फ कागजी कार्रवाई पूरी कर रही थी और जमीनी स्तर पर उसका काम पूरी तरह से विफल था।

इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन लगातार उसे करोड़ों रुपए की रकम अदा करता रहा।

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4. पहले से मौजूद थी चेतावनी:

रिपोर्ट में यह सबूत भी पेश किया गया कि अस्पताल प्रबंधन को इस घटना से बहुत पहले ही खतरे की चेतावनी मिल चुकी थी।

NICU की इंचार्ज सिस्टर कलावती भलावे ने 7 जनवरी, 2025 को ही एक आधिकारिक पत्र लिखकर NICU में चूहों की मौजूदगी की सूचना दी थी और पेस्ट कंट्रोल के लिए अनुरोध किया था।

लेकिन इस पत्र को गंभीरता से नहीं लिया गया और न ही कोई ठोस कार्रवाई की गई।

अगर इस चेतावनी पर तुरंत एक्शन लिया गया होता, तो शायद यह दुर्घटना टाली जा सकती थी।

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5. कंपनी और डॉक्टरों की लापरवाही:

आउटसोर्स कंपनी के मैनेजर प्रदीप रघुवंशी के अपने बयान से भी यह पुष्टि हुई कि पेस्ट कंट्रोल का काम ठीक ढंग से नहीं किया गया था।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पहले नवजात की मौत के बाद भी अस्पताल के कर्मचारियों ने कंपनी के प्रतिनिधियों को कई बार फोन किया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

इसके अलावा, घटना के बाद वरिष्ठ डॉक्टरों ने समय पर बच्चों का परीक्षण नहीं किया और यह जिम्मेदारी सिर्फ रेजीडेंट डॉक्टरों पर ही छोड़ दी गई।

घटना के बाद की गईं कार्रवाइयां

दुर्घटना के बाद जब मामला गर्माया, तो अस्पताल प्रशासन ने तत्काल कुछ कार्रवाइयां कीं।

डीन डॉ. घनघोरिया ने दो नर्सिंग ऑफिसरों को निलंबित किया और कई अन्य कर्मचारियों तथा डॉक्टरों को कारण बताओ नोटिस जारी किए।

पेस्ट कंट्रोल एजेंसी पर एक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया।

हालांकि, जांच रिपोर्ट से स्पष्ट है कि ये कार्रवाइयां केवल निचले स्तर तक सीमित थीं और इन्हें जनता का गुस्सा शांत करने के लिए किया गया है।

असली जिम्मेदार यानी शीर्ष प्रबंधन पर कोई सीधी कार्रवाई नहीं हुई।

रिपोर्ट अब स्पष्ट रूप से बता रही है कि मुख्य जिम्मेदारी डीन और अधीक्षक की ही है।

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न्यायालय और मानव अधिकार आयोग की भूमिका

इस मामले ने अब एक कानूनी और प्रशासनिक रूप ले लिया है।

जांच रिपोर्ट के हाईकोर्ट में पेश होने के बाद अब न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।

कोर्ट यह तय करेगी कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ किस तरह की कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

इसके अलावा, मानव अधिकार आयोग (HRC) ने भी इस मामले में संज्ञान लिया है।

आयोग ने अस्पताल के अधीक्षक को एक महीने के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था।

अब जबकि उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट आ चुकी है, यह देखना होगा कि मानव अधिकार आयोग इस मामले में किस तरह की सिफारिशें करता है।

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