Indore Nagar Nigam Check Ban: इंदौर नगर निगम ने टैक्स भुगतान से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब निगम प्रशासन 1 लाख रुपये तक की राशि का भुगतान चेक के जरिए स्वीकार नहीं करेगा।
यानी अगर आपका टैक्स या कोई अन्य भुगतान 1 लाख रुपये से कम है, तो चेक देने पर उसे नहीं लिया जाएगा।
ऐसे मामलों में अब करदाताओं को ऑनलाइन ट्रांजैक्शन, डिमांड ड्राफ्ट (DD) या फिर कैश (नकद) का ही इस्तेमाल करना पड़ेगा।
निगमायुक्त आईएएस क्षितिज सिंघल की मंजूरी के बाद अपर आयुक्त राजस्व ने इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी कर दिए हैं।

क्यों लिया गया यह फैसला?
निगम प्रशासन का कहना है कि आज के दौर में डिजिटल भुगतान (जैसे यूपीआई, नेट बैंकिंग, क्यूआर कोड) बहुत आसान और सुरक्षित विकल्प बन चुके हैं। इनसे पैसा तुरंत जमा हो जाता है।
हालांकि, अधिकांश लोगों को इस बात की सही जानकारी नहीं है कि ऑनलाइन माध्यमों से 1 लाख रुपये से ज्यादा का ट्रांसफर करने की लिमिट होती है।
इसी वजह से 1 लाख रुपये से अधिक की राशि के लिए तो चेक लिया जाएगा, लेकिन उससे कम की राशि के लिए चेक स्वीकार नहीं होंगे।

37 करोड़ रुपये के चेक बाउंस बने मुख्य वजह
इस कड़े फैसले के पीछे की सबसे बड़ी वजह है—बड़ी संख्या में चेक बाउंस होना।
आंकड़ों के मुताबिक, इंदौर नगर निगम को हर साल करीब 1 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का टैक्स राजस्व मिलता है।
लेकिन बीते सवा साल के अंदर निगम के खजाने को भारी चपत लगी है।
इस दौरान 37 करोड़ रुपये मूल्य के 3266 चेक बाउंस हो गए।
ताज्जुब की बात तो यह है कि इसमें महज 15-15 रुपये तक के भी चेक बाउंस शामिल हैं।

अगर चालू वित्तीय वर्ष की बात करें, तो 1 अप्रैल से 30 जून के बीच ही 6.50 करोड़ रुपये के 566 चेक रिजेक्ट हो चुके हैं।
अपर आयुक्त आकाश सिंह के अनुसार, कई लोगों ने चेक बाउंस होने के बाद दोबारा राशि जमा कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिससे नगर निगम की आय पर सीधा असर पड़ रहा था।
इसी नुकसान से बचने के लिए यह व्यवस्था लागू की गई है।
फैसले का शुरू हुआ विरोध
नगर निगम के इस कदम के सामने आते ही शहर में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर विरोध के सुर भी उठने लगे हैं।
कांग्रेस ने इसे आम जनता और करदाताओं पर जबरन थोपा गया फैसला करार दिया है। कांग्रेस शहर अध्यक्ष चिंटू चौकसे का कहना है कि यह निर्णय मनमाना है।
वहीं, पूर्व पार्षद दिलीप कौशल ने इसे ‘तुगलकी फरमान’ बताते हुए कहा कि इतना बड़ा नीतिगत फैसला सिर्फ अपर आयुक्त या प्रशासनिक आदेश से लागू नहीं किया जा सकता।
इसे लागू करने के लिए महापौर परिषद (MIC) और निगम परिषद की औपचारिक मंजूरी मिलना जरूरी है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर किसी का चेक बाउंस होता है, तो कानून में पहले से ही ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट’ की धारा 138 के तहत कानूनी कार्रवाई का प्रावधान मौजूद है, इसलिए इस तरह का प्रतिबंध लगाना सही नहीं है।
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