UGC New Act Protest: 13 जनवरी को लागू हुए UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए नियमों ने देश की राजनीति और शैक्षणिक गलियारों में आग लगा दी है।
दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश के छोटे जिलों तक, सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के छात्र सड़कों पर हैं।
कहीं सांसदों को चूड़ियां भेजी जा रही हैं, तो कहीं सरकारी अधिकारी इस्तीफा दे रहे हैं।
आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर इन नियमों में ऐसा क्या है, जिस पर इतना बड़ा बवाल खड़ा हो गया है।
#WATCH | Lucknow, UP | Students protest in front of Lucknow University against the UGC policies. pic.twitter.com/ic8iJE8jIG
— ANI (@ANI) January 27, 2026
देशभर में विरोध, दिल्ली में जमा हुए प्रदर्शनकारी
दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित यूजीसी मुख्यालय के बाहर मंगलवार सुबह से ही प्रदर्शनकारियों की भीड़ जमा हो गई।
युवा छात्रों ने हाथों में तख्तियां लेकर नए नियमों के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ये नियम बिना पर्याप्त चर्चा के लागू किए गए हैं और इनसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खत्म हो जाएगी।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ, रायबरेली, वाराणसी, मेरठ, प्रयागराज और सीतापुर समेत कई शहरों में छात्रों और सवर्ण संगठनों ने प्रदर्शन किए।
रायबरेली में भाजपा किसान नेता रमेश बहादुर सिंह और गौरक्षा दल के अध्यक्ष महेंद्र पांडेय ने तो सवर्ण सांसदों को विरोध जताते हुए चूड़ियां भेजी हैं।
यूपी के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इन नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया है।
Delhi: The upper-caste community is set to hold a protest at the UGC headquarters against the new UGC regulations. Security at the UGC office has been tightened, with police setting up barricades to prevent protesters from entering the premises. pic.twitter.com/h8dYjLAhKp
— IANS (@ians_india) January 27, 2026
कुमार विश्वास ने लिखा: “मैं अभागा सवर्ण हूं”
इस मुद्दे पर कवि और पूर्व राजनीतिक कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने एक्स पर लिखा:
“चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा, राई लो या पहाड़ लो राजा, मैं अभागा ‘सवर्ण’ हूं मेरा, रौंया-रौंया उखाड़ लो राजा।”
उनके इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर #UGC_RollBack ट्रेंड करने लगा।
कुमार विश्वास ने साफ तौर पर संकेत दिया कि नए नियम सवर्णों को निशाना बना रहे हैं।
“चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा,
राई लो या पहाड़ लो राजा,
मैं अभागा ‘सवर्ण’ हूँ मेरा,
रौंया-रौंया उखाड़ लो राजा ..।”😢🙏
(स्व० रमेश रंजन) #UGC_RollBack pic.twitter.com/VmsZ2xPiOL— Dr Kumar Vishvas (@DrKumarVishwas) January 27, 2026
क्या है UGC का नया नियम?
UGC ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था।
इसका नाम है- ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026।’
इनका मुख्य उद्देश्य कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है।
इसके तहत कुछ प्रमुख कदम उठाए गए हैं:
- इक्विटी कमेटी (Equity Committee): हर संस्थान में एक विशेष समिति बनाई जाएगी जो भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी।
- इस कमेटी के अध्यक्ष कॉलेज के प्रमुख होंगे।
- कमेटी में SC/ST, OBC, महिलाएं और दिव्यांग शामिल होंगे।
- कमेटी का कार्यकाल 2 साल होगा।
- कॉलेज में एक इक्वलिटी स्क्वाड भी बनेगा, जो भेदभाव पर नजर रखेगा।
- भेदभाव की शिकायत पर 24 घंटे में मीटिंग जरूरी होगी।
- 15 दिन में रिपोर्ट कॉलेज प्रमुख को देनी होगी।
- कॉलेज प्रमुख को 7 दिन में आगे की कार्रवाई शुरू करनी होगी।
- हर कॉलेज में ईक्वल अपॉर्च्यूनिटी सेंटर (EOC) बनेगा।
- EOC पिछड़े और वंचित छात्रों को पढ़ाई, फीस और भेदभाव से जुड़ी मदद देगा।
- EOC हर 6 महीने में कॉलेज को रिपोर्ट देगा।
- कॉलेज को जातीय भेदभाव पर हर साल UGC को रिपोर्ट भेजनी होगी।
- UGC राष्ट्रीय निगरानी कमेटी बनाएगा।
- 24×7 हेल्पलाइन: पीड़ित छात्र किसी भी समय अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे।
- कठोर दंड: अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता, तो उसकी फंडिंग रोकी जा सकती है या उसकी मान्यता तक रद्द हो सकती है।
UGC के खिलाफ लखनऊ विश्वविद्यालय में जोरदार प्रदर्शन, सैकड़ों की संख्या में छात्र धरने पर बैठे #UGCRegulations #UGC pic.twitter.com/6dw7EBM1mr
— Ashish Paswan (@ashishpaswan0) January 27, 2026
क्यों हो रहा है बिल का भारी विरोध?
विरोध कर रहे छात्रों और सवर्ण संगठनों का कहना है कि ये नियम ‘समानता’ के नाम पर ‘असमानता’ पैदा कर रहे हैं।
1. सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व शून्य
आलोचकों का सबसे बड़ा तर्क यह है कि इन समितियों में सामान्य वर्ग (General Category) के सदस्यों के प्रतिनिधित्व का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। उनका मानना है कि जब जांच करने वाली कमेटी में उनकी जाति का कोई व्यक्ति नहीं होगा, तो फैसला एकतरफा हो सकता है।
2. ‘दोषी’ मान लेने की धारणा
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि नियमों की भाषा ऐसी है जैसे जनरल कैटेगरी का छात्र या शिक्षक ‘स्वाभाविक अपराधी’ (Natural Offender) हो। उन्हें डर है कि केवल शिकायत दर्ज होने मात्र से ही उन्हें दोषी मान लिया जाएगा और उनकी बात नहीं सुनी जाएगी।
3. फर्जी शिकायतों का डर
सवर्ण संगठनों को आशंका है कि इन सख्त नियमों का दुरुपयोग किया जा सकता है। आपसी रंजिश निकालने के लिए सवर्ण छात्रों और प्रोफेसरों के खिलाफ झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें दर्ज कराई जा सकती हैं, जिससे उनका करियर बर्बाद हो सकता है।
4. संस्थानों की स्वायत्तता पर खतरा
नियमों में दंडात्मक प्रावधान इतने कड़े हैं कि संस्थानों को अपनी फंडिंग खोने का डर सता रहा है। इससे कॉलेजों में स्वतंत्र शैक्षणिक माहौल के बजाय डर और अविश्वास का वातावरण पैदा हो सकता है।
Sonbhadra, Uttar Pradesh: Sawarn Army activists, joined by hundreds of students, held a sit-in at the Collectorate demanding the repeal of the UGC Act. pic.twitter.com/kvtgoFPmp9
— IANS (@ians_india) January 27, 2026
सरकार और यूजीसी की सफाई
भारी विरोध के बीच केंद्र सरकार ने बयान जारी कर शांति की अपील की है।
सरकार का कहना है कि ये नियम किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि उच्च शिक्षा में समावेशी माहौल बनाने के लिए हैं।
यूजीसी का तर्क है कि ये नियम केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और ओबीसी (OBC) छात्रों को सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिन्हें बरसो से भेदभाव का सामना करना पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
मामला अब अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है।
एडवोकेट विनीत जिंदल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर ‘रेगुलेशन 3(सी)’ पर रोक लगाने की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि ये नियम सामान्य वर्ग के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और पूरे ढांचे को सभी जातियों के लिए समान बनाया जाना चाहिए।
रोहित वेमुला-पायल तडवी की आत्महत्या के बाद बने थे नए नियम
2012 में यूजीसी ने पहले कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे, लेकिन वे केवल सुझाव के तौर पर थे, अनिवार्य नहीं।
मगर 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला और 2019 में महाराष्ट्र की डॉक्टर पायल तडवी की आत्महत्या के मामलों ने देशभर को हिला दिया।
दोनों के परिवारों ने जातीय उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
इसके बाद वेमुला और तडवी के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
कोर्ट ने जनवरी 2025 में यूजीसी को सख्त नियम बनाने का निर्देश दिया, जिसके बाद ये ‘2026 के नियम’ अस्तित्व में आए।


