Swami Avimukteshwaranand Notice: प्रयागराज के माघ मेले में 3 दिन से धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अब माघ मेला प्राधिकरण ने एक कानूनी नोटिस थमाया है।
नोटिस में प्रशासन ने सीधा और तीखा सवाल पूछा है— “आप खुद को शंकराचार्य कैसे लिख सकते हैं?”
प्रशासन का कहना है कि ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य का मामला वर्तमान में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में लंबित है।
14 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि जब तक इस मामले का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक किसी को भी ज्योतिषपीठ का नया शंकराचार्य घोषित नहीं किया जा सकता और न ही किसी का पट्टाभिषेक हो सकता है।

नोटिस में क्या लिखा है?
माघ मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से जारी इस नोटिस में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश (Stay Order) के बावजूद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर के बाहर लगे बोर्ड पर ‘शंकराचार्य’ शब्द का इस्तेमाल किया है।
प्रशासन ने इसे कोर्ट की अवमानना माना है और स्वामी जी से 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा है कि वह किस आधार पर इस पदवी का उपयोग कर रहे हैं।
#BREAKING: Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand has been served a notice overnight by the Prayagraj Mela Authority. The notice, citing a Supreme Court order, states that he is not the Shankaracharya of the Jyotishpeeth, and questions how he is using the title “Shankaracharya.”… pic.twitter.com/K8rREAOFea
— IANS (@ians_india) January 20, 2026
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क
इस कानूनी घेराबंदी के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना पक्ष मजबूती से रखा।
उनका कहना है कि “शंकराचार्य कौन होगा, यह न तो देश का राष्ट्रपति तय कर सकता है और न ही प्रशासन।”
उन्होंने तर्क दिया कि सनातन परंपरा के अनुसार, एक शंकराचार्य की वैधता अन्य तीन पीठों के शंकराचार्यों की सहमति से तय होती है।
उन्होंने दावा किया कि दो पीठों का उन्हें स्पष्ट समर्थन प्राप्त है और तीसरी पीठ (पुरी) मौन है, जिसे मौन स्वीकृति माना जाना चाहिए।
“Even the President of India has No authority to decide who is a Shankaracharya. Only Shankaracharyas decide Shankaracharyas.”
— Swami Avimukteshwaranand https://t.co/P8evIgDZqm pic.twitter.com/Mka8pfwI3p
— The News Drill™ (@thenewsdrill) January 20, 2026
स्वामी जी ने प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा कि वह पिछले मेलों में भी इसी पदवी के साथ स्नान कर चुके हैं, तब प्रशासन को कोई आपत्ति क्यों नहीं थी?
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक प्रशासन दुर्व्यवहार के लिए माफी नहीं मांगता, वह शिविर में नहीं लौटेंगे और फुटपाथ पर ही रहेंगे।
Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand manages to do something or the other in every bath that lands him in the headlines
He returning in anger without taking the bath because the officers asked him to walk to the Sangam Nose, and he wasn’t willing to step down from his throne pic.twitter.com/OgUPAhURs3— Sachin (@Sachin54620442) January 18, 2026
क्यों शुरू हुआ विवाद
यह विवाद तब शुरू हुआ जब मौनी अमावस्या (18 फरवरी) के पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिष्यों के साथ पालकी में बैठकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे।
पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ का हवाला देते हुए उनकी पालकी को रोक दिया और पैदल जाने का अनुरोध किया।
इसी बात को लेकर पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का-मुक्की हुई, जिसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए।
This is the True Face of these “so called” thekedars of Hinduism
In Prayagraj, during the Magh Mela, police and officials stopped the procession of Jagadguru Shankaracharya Avimukteshwaranand and beat and pushed around elderly saints and young boys reciting Vedic hymns. The… pic.twitter.com/bXKrQNk22U
— Harmeet Kaur K (@iamharmeetK) January 18, 2026
ज्योतिषपीठ विवाद का इतिहास
यह पूरा मामला शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शुरू हुआ।
उनकी मृत्यु के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिषपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया, लेकिन दूसरी ओर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती भी इस पीठ पर अपना दावा पेश करते हैं।
उत्तराधिकार की यह लड़ाई दशकों पुरानी है, जो अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है।
कोर्ट का स्टे होने के कारण तकनीकी रूप से इस पद पर किसी का भी दावा अभी ‘अंतिम’ नहीं माना गया है।

फिलहाल प्रयागराज में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।
एक तरफ प्रशासन कानून और कोर्ट के आदेशों की दुहाई दे रहा है, तो दूसरी तरफ संत समाज अपनी परंपरा और स्वाभिमान की बात कर रहा है।
24 घंटे की समयसीमा खत्म होने के बाद प्रशासन क्या कार्रवाई करेगा, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।


