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3 दिन से धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को प्रशासन का नोटिस, 24 घंटे में ‘शंकराचार्य’ पदवी का प्रमाण मांगा

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Swami Avimukteshwaranand Notice: प्रयागराज के माघ मेले में 3 दिन से धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अब माघ मेला प्राधिकरण ने एक कानूनी नोटिस थमाया है।

नोटिस में प्रशासन ने सीधा और तीखा सवाल पूछा है— “आप खुद को शंकराचार्य कैसे लिख सकते हैं?”

प्रशासन का कहना है कि ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य का मामला वर्तमान में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में लंबित है।

14 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि जब तक इस मामले का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक किसी को भी ज्योतिषपीठ का नया शंकराचार्य घोषित नहीं किया जा सकता और न ही किसी का पट्टाभिषेक हो सकता है।

Avimukteshwaranand vs Prayagraj Administration, Shankaracharya Padvi Vivad

नोटिस में क्या लिखा है?

माघ मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से जारी इस नोटिस में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश (Stay Order) के बावजूद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर के बाहर लगे बोर्ड पर ‘शंकराचार्य’ शब्द का इस्तेमाल किया है।

प्रशासन ने इसे कोर्ट की अवमानना माना है और स्वामी जी से 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा है कि वह किस आधार पर इस पदवी का उपयोग कर रहे हैं।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क

इस कानूनी घेराबंदी के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना पक्ष मजबूती से रखा।

उनका कहना है कि “शंकराचार्य कौन होगा, यह न तो देश का राष्ट्रपति तय कर सकता है और न ही प्रशासन।”

उन्होंने तर्क दिया कि सनातन परंपरा के अनुसार, एक शंकराचार्य की वैधता अन्य तीन पीठों के शंकराचार्यों की सहमति से तय होती है।

उन्होंने दावा किया कि दो पीठों का उन्हें स्पष्ट समर्थन प्राप्त है और तीसरी पीठ (पुरी) मौन है, जिसे मौन स्वीकृति माना जाना चाहिए।

स्वामी जी ने प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा कि वह पिछले मेलों में भी इसी पदवी के साथ स्नान कर चुके हैं, तब प्रशासन को कोई आपत्ति क्यों नहीं थी?

उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक प्रशासन दुर्व्यवहार के लिए माफी नहीं मांगता, वह शिविर में नहीं लौटेंगे और फुटपाथ पर ही रहेंगे।

क्यों शुरू हुआ विवाद

यह विवाद तब शुरू हुआ जब मौनी अमावस्या (18 फरवरी) के पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिष्यों के साथ पालकी में बैठकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे।

पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ का हवाला देते हुए उनकी पालकी को रोक दिया और पैदल जाने का अनुरोध किया।

इसी बात को लेकर पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का-मुक्की हुई, जिसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए।

ज्योतिषपीठ विवाद का इतिहास

यह पूरा मामला शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शुरू हुआ।

उनकी मृत्यु के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिषपीठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया, लेकिन दूसरी ओर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती भी इस पीठ पर अपना दावा पेश करते हैं।

उत्तराधिकार की यह लड़ाई दशकों पुरानी है, जो अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है।

कोर्ट का स्टे होने के कारण तकनीकी रूप से इस पद पर किसी का भी दावा अभी ‘अंतिम’ नहीं माना गया है।

Avimukteshwaranand vs Prayagraj Administration, Shankaracharya Padvi Vivad

फिलहाल प्रयागराज में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।

एक तरफ प्रशासन कानून और कोर्ट के आदेशों की दुहाई दे रहा है, तो दूसरी तरफ संत समाज अपनी परंपरा और स्वाभिमान की बात कर रहा है।

24 घंटे की समयसीमा खत्म होने के बाद प्रशासन क्या कार्रवाई करेगा, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।

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