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महाकाल मंदिर में महिलाओं की हल्दी होली पर उठे सवाल, पुजारियों ने कहा- शास्त्रों में नहीं है इसका जिक्र

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Mahakal Haldi Holi Controversy: उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल के दरबार में इन दिनों ‘महा शिवनवरात्रि’ का उत्सव चल रहा है।

मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर शिव-पार्वती का विवाह हुआ था, इसलिए नौ दिनों तक भगवान का विशेष श्रृंगार होता है।

लेकिन इस साल, मंदिर परिसर में महिलाओं द्वारा एक-दूसरे को हल्दी लगाने और नाच-गाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।

मंदिर के पुजारियों का कहना है कि यह ‘हल्दी उत्सव’ शास्त्रों के अनुसार नहीं है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए।

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नियमों का उल्लंघन, पुजारियों ने जताया विरोध

विवाद की जड़ मंदिर परिसर में होने वाला वह आयोजन है, जिसमें करीब 50 से 100 महिलाएं हर सुबह भजन-मंडली के साथ जुटती हैं। वे

भगवान शिव के विवाह की खुशी में झूमती-नाचती हैं और एक-दूसरे के चेहरे पर हल्दी लगाती हैं।

पुजारियों के अनुसार, शिवनवरात्रि केवल पूजा, कठिन साधना और संकल्प का समय है।

मंदिर के पुजारी महेश शर्मा का कहना है कि लोग अब इसे एक ‘इवेंट’ या मजाक की तरह लेने लगे हैं।

शिव पुराण या किसी अन्य धार्मिक ग्रंथ में शिवरात्रि पर इस तरह हल्दी खेलने का कोई जिक्र नहीं मिलता।

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कैसे शुरू हुई यह नई रीत?

हैरानी की बात यह है कि यह परंपरा सदियों पुरानी नहीं है।

बताया जा रहा है कि मंदिर में नियमित दर्शन के लिए आने वाली महिलाओं ने करीब 11 साल पहले इसकी शुरुआत की थी।

मंदिर में कोटेश्वर भगवान को उबटन लगाने की परंपरा है, जिससे प्रेरित होकर श्रद्धालुओं ने इसे ‘शिव विवाह’ के उबटन की रस्म समझ लिया।

धीरे-धीरे यह एक बड़ा आयोजन बन गया, जहां ढोल-नगाड़ों के साथ महिलाएं उत्सव मनाने लगीं।

प्रशासन की सख्ती और सुरक्षा की चिंता

पुजारियों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह सनातन परंपरा के लिए घातक हो सकता है।

मंदिर प्रशासन को भी इस संबंध में कई लिखित शिकायतें मिली हैं।

श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ और मंदिर की मर्यादा को देखते हुए प्रशासक ने संकेत दिए हैं कि जल्द ही परिसर में इस तरह के नाच-गाने और हल्दी खेलने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है

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