Supreme Court Mahakal VIP Darshan: उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर के दरबार में आम और खास के बीच चल रही कानूनी लड़ाई में एक नया मोड़ आया है।
लंबे समय से भक्तों के बीच यह चर्चा का विषय था कि जब भगवान के सामने सब एक हैं, तो दर्शन की व्यवस्था में इतना अंतर क्यों?
इसी सवाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिस पर न्यायालय ने अपना रुख साफ कर दिया है।
Did the SC Reject the Challenge Against VIP Darshan at Mahakaleshwar Temple? The Supreme Court has dismissed a petition challenging the VIP darshan practice
at the Mahakaleshwar Temple, underlining that such matters are for authorities
to decide, not… https://t.co/ahLE7FJJqw pic.twitter.com/4a1IjNNJVh— NationPress (@np_nationpress) January 27, 2026
क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत तब हुई जब जुलाई 2023 में सावन के महीने के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आम श्रद्धालुओं का गर्भगृह में प्रवेश बंद कर दिया गया था।
उस समय मंदिर प्रशासन ने वादा किया था कि सावन बीतने के बाद इसे फिर से खोल दिया जाएगा।
हालांकि, ‘महाकाल लोक’ बनने के बाद भक्तों की संख्या 20-30 हजार से बढ़कर रोजाना 2 लाख तक पहुंच गई, जिसके कारण सुरक्षा और व्यवस्था के नाम पर आम लोगों के लिए गर्भगृह के कपाट बंद ही रहे।
Shri Mahakaleshwar Mahakal Mangal Aarti Darshan
When time itself bows in surrender, Mahakal awakens 🙏 pic.twitter.com/fMHigygYSl— Dharma Tales (@Dharma_Tales) January 12, 2026
विवाद तब और गहरा गया जब यह देखा गया कि आम जनता तो बाहर से दर्शन कर रही है, लेकिन राजनेता, अधिकारी और रसूखदार लोग ‘वीआईपी’ बनकर गर्भगृह में जाकर जल अर्पित कर रहे हैं।
इसी ‘भेदभाव’ के खिलाफ अधिवक्ता चर्चित शास्त्री और दर्पण अवस्थी ने पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मंदिर की व्यवस्था चलाना अदालतों का काम नहीं है।
न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं:
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प्रशासनिक अधिकार: कोर्ट ने माना कि गर्भगृह में किसे प्रवेश देना है और किसे नहीं, यह तय करने का अधिकार स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन समिति का है।
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हस्तक्षेप से इनकार: बेंच ने कहा कि अगर अदालतें हर मंदिर के नियमों में दखल देने लगेंगी, तो यह न्यायिक सीमाओं के बाहर होगा।
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अनुच्छेद 14 का तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि धर्म और परंपराओं के मामलों में इस तरह के तर्क हर जगह लागू नहीं किए जा सकते।
Divya Darshan of Mahakal from Mahakaleshwar Dham pic.twitter.com/wzP7g6NszI
— Vaibhav 🚩🇮🇳🚩 (@Jayatu_Sanatan) December 28, 2024
कलेक्टर की भूमिका महत्वपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें उज्जैन कलेक्टर को सर्वेसर्वा बनाया गया है।
अब यह पूरी तरह कलेक्टर के विवेक पर निर्भर करेगा कि वे किसे ‘वीआईपी’ मानकर गर्भगृह में जाने की अनुमति देते हैं।
यदि कलेक्टर किसी विशेष परिस्थिति में किसी को अनुमति देते हैं, तो उसे नियम का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

नेताओं और जनता की मांग
हैरानी की बात यह है कि इस व्यवस्था का विरोध केवल आम जनता ही नहीं, बल्कि खुद स्थानीय नेता भी कर रहे हैं।
उज्जैन के सांसद अनिल फिरोजिया और महापौर ने भी मुख्यमंत्री से अनुरोध किया था कि आम श्रद्धालुओं के लिए कम से कम कुछ समय के लिए गर्भगृह खोला जाना चाहिए।
उनका तर्क है कि ₹1500 की रसीद वाली पुरानी व्यवस्था को वापस लाया जाए ताकि आम भक्त भी बाबा के करीब जा सकें।
Start your day with the Divine and Blissful Aarti Darshan Of
MAHAKAL MAHADEV 🔱📿 pic.twitter.com/jUTIeCuAc9— Sheetal 🇮🇳 🚩 (@Sheetal83879466) February 10, 2025
फिलहाल मंदिर में भारी भीड़ और ज्योतिर्लिंग के संरक्षण (क्षरण रोकने) की चुनौतियों के बीच प्रशासन को ऐसा रास्ता निकालना होगा जिससे आस्था भी बनी रहे और व्यवस्था भी न बिगड़े।
आम भक्तों को फिलहाल नंदी हॉल या कार्तिकेय मंडपम से ही संतोष करना होगा।


