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चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं ममता, CJI से बोलीं- बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Mamata Banerjee Supreme Court: भारतीय न्यायिक इतिहास में 4 फरवरी, बुधवार का दिन बेहद खास रहा।

आमतौर पर जब भी सरकार और चुनाव आयोग के बीच कोई विवाद होता है, तो बड़े-बड़े वकील जिरह करते हैं।

लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी सरकार और राज्य के लोगों का पक्ष रखने के लिए खुद कोर्ट रूम नंबर 1 में मौजूद थीं।

यह पहली बार है जब किसी राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री ने खुद पेश होकर ‘इन पर्सन’ दलीलें दीं।

क्या है विवाद? 

मामले की जड़ में है ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR)

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की गहन जांच का आदेश दिया है।

आयोग का कहना है कि वे लिस्ट को साफ-सुथरा कर रहे हैं ताकि असमानताएं दूर हों।

Mamata Banerjee Supreme Court

लेकिन ममता बनर्जी का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया दोषपूर्ण है और चुनाव से ठीक पहले जानबूझकर बंगाल को परेशान करने के लिए लाई गई है।

ममता का कहना है कि करीब 1.4 करोड़ लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं।

इनमें से कई लोगों के नाम इसलिए ‘फ्लैग’ (चिन्हित) कर दिए गए हैं क्योंकि उनके माता-पिता के नाम में मामूली अंतर है या उम्र को लेकर अंतर है।

ममता का सवाल है कि जो काम 2 साल में होना चाहिए था, उसे चुनाव से ठीक 3 महीने पहले इतनी हड़बड़ी में क्यों किया जा रहा है?

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सुप्रीम कोर्ट में ममता की दलीलें

ममता बनर्जी ने अपनी दलीलों में कई गंभीर आरोप लगाए।

उन्होंने कहा, “मैं यहां अपनी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि बंगाल की जनता के लिए आई हूं। खेती का मौसम चल रहा है और गरीब लोगों को दस्तावेजों के लिए इधर-उधर भगाया जा रहा है।”

उन्होंने कोर्ट के सामने कुछ प्रमुख बिंदु रखे:

  • भेदभाव का आरोप: ममता ने पूछा कि अगर यह प्रक्रिया इतनी ही जरूरी है, तो यह केवल बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ही क्यों हो रही है? भाजपा शासित असम को इससे बाहर क्यों रखा गया है?
  • प्रताड़ना का मुद्दा: मुख्यमंत्री ने दावा किया कि चुनाव आयोग (ECI) के दबाव और इस थका देने वाली प्रक्रिया के कारण राज्य के 100 से ज्यादा लोगों और कई बीएलओ (BLO) की जान जा चुकी है।
  • नोटिस की कमी: ममता के वकीलों ने बताया कि 32 लाख मतदाता ऐसे हैं जिनकी मैपिंग में गड़बड़ी बताई गई है, लेकिन उन्हें यह नहीं बताया गया कि उनके नाम क्यों हटाए जा रहे हैं या क्यों चिन्हित किए गए हैं।

CJI और ममता के बीच बातचीत

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और ममता बनर्जी के बीच सीधा संवाद हुआ।

जब ममता ने कहा कि “न्याय, दरवाजे के पीछे रो रहा है,” तब कोर्ट ने उनकी बात को गंभीरता से सुना।

CJI ने स्पष्ट किया कि असली मतदाताओं के नाम लिस्ट से नहीं हटने चाहिए।

कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या नोटिस में कारण बताए जा रहे हैं?

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इस पर आयोग के वकील ने दावा किया कि सभी नोटिस में कारण लिखे होते हैं।

हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि मतदाताओं को यह पता होना चाहिए कि उनके नाम पर आपत्ति क्यों जताई गई है।

चुनाव आयोग से तल्खी

इससे पहले ममता बनर्जी ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की थी। वहां से वे काफी नाराज होकर निकली थीं।

ममता ने आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्त का व्यवहार ‘अहंकारी’ था और वे किसी ‘जमींदार’ की तरह बात कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि आयोग ने उनके द्वारा लिखे गए 6 पत्रों का कोई जवाब नहीं दिया।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी (सोमवार) को तय की है।

कोर्ट ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से जवाब मांगा है।

ममता बनर्जी की मांग है कि जिन लोगों के नाम विसंगतियों (Name Mismatch) के आधार पर लिस्ट से हटाने की तैयारी है, उन नोटिसों को तुरंत वापस लिया जाए और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।

ममता बनर्जी का खुद कोर्ट में उतरना यह दिखाता है कि बंगाल चुनाव से पहले यह मुद्दा कितना बड़ा राजनीतिक रूप ले चुका है।

सोमवार को होने वाली सुनवाई तय करेगी कि बंगाल की मतदाता सूची में 1.4 करोड़ लोगों का भविष्य क्या होगा।

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