Mohan Bhagwat RSS Chief: आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम में दो महत्वपूर्ण बयान दिए।
उन्होंने भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बताते हुए कहा कि इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।
साथ ही, उन्होंने परिवार संस्था के महत्व पर जोर देते हुए लिव-इन रिलेशनशिप की प्रथा को जिम्मेदारी से भागने का रास्ता बताया।
आरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन में भारतीय समाज में परिवार की मजबूत संरचना को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

मोहन भागवत का परिवार और लिव-इन पर विचार
उनका कहना था कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोग सामाजिक जिम्मेदारी लेने के इच्छुक नहीं होते।
भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “लिव-इन रिलेशनशिप वाले जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं तो आप संन्यासी बनें।”
उन्होंने परिवार को केवल शारीरिक संतुष्टि का साधन नहीं, बल्कि समाज की मूल इकाई बताया।
उनके अनुसार, परिवार वह स्थान है जहां व्यक्ति सामाजिक मूल्य सीखता है और यह सांस्कृतिक, आर्थिक व सामाजिक इकाई का संगम है।
भागवत ने कहा कि देश की बचत और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी परिवारों के माध्यम से ही होता है।
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— Economic Times (@EconomicTimes) December 22, 2025
“भारत हिंदू राष्ट्र है, मंजूरी की जरूरत नहीं”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘100 व्याख्यान माला’ में मोहन भागवत ने कहा कि भारत प्राकृतिक रूप से एक हिंदू राष्ट्र है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “सूर्य पूर्व से उगता है, क्या इसके लिए भी संवैधानिक स्वीकृति चाहिए?”
उनका तर्क था कि जो कोई भी भारत को अपनी मातृभूमि मानता है और भारतीय संस्कृति व पूर्वजों का सम्मान करता है, वह हिंदू है।
उन्होंने घोषणा की कि जब तक यह भावना देश में बनी रहेगी, भारत हिंदू राष्ट्र बना रहेगा और इसे किसी कानूनी स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।
ASSERTION: RSS chief Mohan Bhagwat has reignited the Hindu Rashtra debate after remarking that Hindustan is inherently a Hindu nation, comparing it to the sun rising in the east, and questioning whether such a civilisational reality requires constitutional approval. pic.twitter.com/cFDyJt1moP
— On Record (@OnRecordIndia) December 23, 2025
आदर्श परिवार और बच्चों के बारे में क्या कहा?
परिवार नियोजन के विषय पर बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि बच्चों की संख्या या विवाह की उम्र का कोई कठोर फॉर्मूला नहीं होना चाहिए, यह पति-पत्नी का निर्णय है।
हालांकि, उन्होंने कुछ शोधों का हवाला देते हुए सुझाव दिया कि 19 से 25 वर्ष की आयु के बीच विवाह और तीन बच्चे होना आदर्श स्थिति हो सकती है।
उनके अनुसार, इससे माता-पिता और बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और लोग ‘ईगो मैनेजमेंट’ भी सीखते हैं।

मोहन भागवत के ये बयान सामाजिक-सांस्कृतिक बहस के केंद्र में हैं।
एक तरफ वे भारत की पहचान को हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित करने पर जोर दे रहे हैं, तो दूसरी ओर पारंपरिक परिवार व्यवस्था को मजबूत करने और लिव-इन जैसी आधुनिक प्रथाओं पर सवाल उठा रहे हैं।


