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काम के बोझ तले दबे BLO: 10 दिन में 6 की मौत, कर्मचारी संगठन ने की मुआवजे की मांग

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 13 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

BLO Death-SIR Survey मध्य प्रदेश में इन दिनों चुनावी तैयारियों के नाम पर एक ऐसा काम चल रहा है जिसने राज्य के हजारों कर्मचारियों की जिंदगी को संकट में डाल दिया है।

‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) नामक इस प्रक्रिया में लगे बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) काम के कार्यभार और दबाव की वजह से या तो अपनी जान गंवा रहे हैं या फिर गंभीर रूप से बीमार पड़ रहे हैं।

महज 10 दिनों के अंदर प्रदेश में 6 बीएलओ की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य अस्पतालों में अपनी जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।

यह स्थिति सवाल खड़ा कर रही है कि क्या एक डेटा संग्रह की प्रक्रिया किसी की जान से ज्यादा कीमती है?

क्या है SIR?

मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों के लिए मतदाता सूची का ‘विशेष गहन सर्वेक्षण’ 4 नवंबर से शुरू हुआ है।

इसके तहत प्रदेश के कुल 5 करोड़ 74 लाख से अधिक मतदाताओं के फॉर्म को डिजिटलाइज करना है।

इस बड़े काम को अंजाम देने की जिम्मेदारी 65 हजार से अधिक बीएलओ पर डाल दी गई है।

ज्यादातर बीएलओ शिक्षक या अन्य सरकारी कर्मचारी हैं, जिन्हें उनकी नियमित ड्यूटी के अलावा यह अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है।

क्यों है इतना दबाव?

समस्या की जड़ है समय सीमा। इस पूरी प्रक्रिया को महज एक महीने में पूरा करना है।

कई जिलों में काम बहुत पिछड़ा हुआ है।

उदाहरण के लिए, भोपाल में अब तक केवल 37% फॉर्म ही ऑनलाइन अपलोड हो पाए हैं।

यानी बाकी के 63% फॉर्म को अगले 10 दिनों में प्रोसेस करना है।

इसके लिए बीएलओ को घर-घर जाकर फॉर्म बांटने, उन्हें वापस इकट्ठा करने, उनकी जांच करने और फिर ऑनलाइन पोर्टल पर डालने का काम करना है।

अक्सर तकनीकी गड़बड़ियां जैसे सर्वर डाउन होना उनकी मुश्किलें और बढ़ा देता है।

काम पूरा न होने पर निलंबन का डर उन पर लगातार मंडरा रहा है।

वो 6 BLO, जिन्होंने गंवा दी जान

आइए जानते हैं उन 6 बीएलओ के बारे में, जिन्होंने अपनी जान गंवा दी है।

  1. मनीराम नापित (शहडोल): सोमवार को शहडोल के सोहागपुर में मनीराम (54) लोगों से फॉर्म भरवा रहे थे। इसी दौरान एक अधिकारी का फोन आया। फोन रखने के तुरंत बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई। उनके बेटे आदित्य ने बताया कि पिता तनाव में थे। मेडिकल कॉलेज ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।
  2. सुजान सिंह रघुवंशी (नर्मदापुरम): तीन दिन पहले, SIR सर्वे करके लौट रहे इस सहायक शिक्षक की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई। हादसा रेलवे ट्रैक पार करते समय हुआ। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भोपाल के एक अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
  3. रमाकांत पांडे (मंडीदीप): 20 नवंबर की रात रमाकांत एक ऑनलाइन मीटिंग में शामिल हुए। मीटिंग खत्म होने के महज 10 मिनट बाद वॉशरूम में गिर पड़े। परिवार ने उन्हें तुरंत अस्पताल ले गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
  4. भुवान सिंह चौहान (झाबुआ): इस शिक्षक की मौत सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है। 18 नवंबर को कथित लापरवाही के आरोप में उन्हें निलंबित कर दिया गया। निलंबन के तनाव को वह सह नहीं पाए और उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी मौत हो गई। परिवार का सीधा आरोप है कि बेबसी और शर्मिंदगी ने उनकी जान ले ली।
  5. सीताराम गोंड (दमोह): सीताराम की तबीयत काम के दौरान बिगड़ी। उन्हें पहले दमोह और फिर जबलपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
  6. अनीता नागेश्वर (बालाघाट): आंगनबाड़ी कार्यकर्ता अनीता (50) की 13 नवंबर को तबीयत बिगड़ने के बाद नागपुर के एक अस्पताल में मौत हो गई। उनकी बेटी आरती का कहना है कि काम के प्रेशर ने ही उनकी मां को बीमार किया। सरपंच ने परिवार को मुआवजा और नौकरी की मांग की है।

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सिर्फ मौतें ही नहीं, अस्पतालों में भी संघर्ष

इन मौतों के अलावा, कई बीएलओ गंभीर रूप से बीमार हैं और अस्पतालों में भर्ती हैं।

  • भोपाल: बीएलओ कीर्ति कौशल और मोहम्मद लईक को ड्यूटी के दौरान हार्ट अटैक आया, जिन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया।
  • रीवा: बीएलओ विजय पांडेय को ब्रेन हेमरेज हो गया। परिजनों का आरोप है कि बुखार होने के बावजूद अधिकारी उन पर काम पूरा करने का दबाव बना रहे थे।
  • भिंड: शिक्षक रविंद्र शाक्य, जो पहले से ही दिल की बीमारी से पीड़ित थे, को ड्यूटी के दौरान हार्ट अटैक आया। परिवार का कहना है कि अधिकारियों ने उनकी बीमारी को “बहाना” बताया और निलंबन की धमकी देकर सुबह 9 से रात 11 बजे तक काम पर लगाए रखा।

कर्मचारी संगठन ने उठाई आवाज, मांगा मुआवजा

इन घटनाओं के बाद मध्य प्रदेश तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ सक्रिय हुआ है।

संघ के प्रदेश महामंत्री उमाशंकर तिवारी ने बताया, “यह 1-2 दिन नहीं, पूरे एक महीने की ड्यूटी है। टारगेट पूरा करने के चक्कर में कई बीएलओ तनाव में हैं। इस वजह से कोई हादसे का शिकार हुआ तो किसी को हार्ट अटैक आ गया।”

संघ ने मुख्य चुनाव आयुक्त को एक पत्र लिखकर मांग की है कि चुनाव के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं की तर्ज पर इन कर्मचारियों को भी राहत दी जाए।

मांग है कि मृतक कर्मचारी के परिवार को 15 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए और बीमार पड़ने वाले कर्मचारियों के इलाज का पूरा खर्च वहन किया जाए।

इंसानियत बनाम व्यवस्था

मध्य प्रदेश में बीएलओ की हो रही मौतें सिर्फ आकस्मिक दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक टूटी हुई व्यवस्था की पीड़ादायक गवाह हैं।

यह मामला दिखाता है कि कैसे लक्ष्य और समय सीमा का अमानवीय दबाव सरकार के अपने ही कर्मचारियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों को नजरअंदाज करना और निलंबन का भय दिखाना एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है।

अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार इस संकट पर तुरंत ध्यान दे।

केवल मुआवजे की घोषणा करना ही काफी नहीं है।

बीएलओ के काम के घंटों को नियंत्रित करना, उनके लिए पर्याप्त संसाधन और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना होगा जहां उनकी सेहत और परिवार को प्राथमिकता दी जाए। ताकि देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने वाले इन कर्मचारियों की जान बचाई जा सके।

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