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सत्ता गई-पद गया, पर नहीं छूटा सरकारी बंगले का मोह: अब मोहन सरकार ने लिया बड़ा एक्शन

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Govt Bungalow Eviction: लोकतंत्र में पद और प्रतिष्ठा सेवा के माध्यम होते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में एक अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिल रही है।

यहां कई ऐसे कद्दावर नेता और आला अधिकारी हैं, जिनकी पात्रता खत्म हो चुकी है, पद जा चुका है और चुनाव में हार भी मिल चुकी है, फिर भी वे सरकारी बंगलों का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं।

अब मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार ने इन ‘अवैध’ कब्जों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

सरकार ने साफ कर दिया है कि नियम सबके लिए बराबर हैं और अब बल प्रयोग से लेकर भारी जुर्माने तक की तैयारी कर ली गई है।

दिग्गज नेताओं पर लटकी तलवार

मध्य प्रदेश की राजनीति के कई बड़े चेहरे इस समय सरकार के निशाने पर हैं।

पूर्व राजस्व मंत्री रामपाल सिंह, पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और पूर्व सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया जैसे नाम इस सूची में प्रमुख हैं।

ये सभी नेता 2023 के विधानसभा चुनाव में हार का स्वाद चख चुके हैं, लेकिन हार के दो साल बाद भी इन्होंने मंत्रियों को मिलने वाले आलीशान सरकारी आवास खाली नहीं किए हैं।

वहीं, यशोधरा राजे सिंधिया, जो वर्तमान में विधायक भी नहीं हैं, उन्होंने भी अपना सरकारी बंगला नहीं छोड़ा है।

भोपाल की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है; सांसद न रहने के बावजूद वे सरकारी आवास में डटी हुई हैं।

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इन सभी को नोटिस जारी किए जा चुके हैं और अब रियायत की उम्मीद कम है।

प्रभात झा के परिवार को अंतिम चेतावनी

बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वर्गीय प्रभात झा के परिवार को प्रशासन ने सबसे कड़ा अल्टीमेटम दिया है।

संपदा संचालनालय ने नोटिस जारी कर स्पष्ट किया है कि यदि 13 जनवरी तक बंगला खाली नहीं किया गया, तो प्रशासन ‘बल प्रयोग’ कर बेदखली की कार्रवाई करेगा।

इस मामले में प्रभात झा के बेटे तुश्मुल झा का कहना है कि वे खुद बंगला खाली करने की प्रक्रिया में हैं और खरमास के कारण देरी हुई है।

उन्होंने यह भी माना कि पात्रता खत्म होने के बाद सरकारी संसाधनों का उपयोग नहीं करना चाहिए।

अफसरों पर भी कसा शिकंजा

केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि रसूखदार अधिकारी भी इस फेहरिस्त में शामिल हैं।

संपदा संचालनालय ने भोपाल में तैनात 4 IAS अधिकारियों सहित कुल 7 वरिष्ठ अफसरों को नोटिस थमाया है।

इनमें सुधीर कोचर, अदिति गर्ग, रत्नाकर झा और निधि सिंह जैसे नाम शामिल हैं।

इसके अलावा रिटायर्ड आईपीएस सुधीर शाही को भी बंगला खाली करने को कहा गया है।

अक्सर देखा जाता है कि तबादला होने या रिटायर होने के बाद भी अधिकारी लंबे समय तक बंगलों पर कब्जा बनाए रखते हैं, जिससे नए आने वाले अधिकारियों को आवास की समस्या का सामना करना पड़ता है।

जुर्माने का ’30 गुना’ प्रहार

सरकार ने केवल नोटिस नहीं दिया है, बल्कि आर्थिक चोट करने की भी तैयारी की है।

विधि विभाग ने एक सख्त प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके तहत:

  1. शुरुआती 3 महीने: सामान्य किराया लिया जाएगा।
  2. अगले 3 महीने: सामान्य से 10 गुना अधिक किराया वसूला जाएगा।
  3. उसके बाद भी कब्जा रहा तो: बाजार दर से 30 गुना अधिक किराया वसूला जाएगा। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि भारी भरकम बिल के डर से लोग स्वतः ही आवास खाली कर दें।

पात्रता से बड़े बंगलों का खेल

रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि कई वर्तमान विधायक ऐसे बंगलों में रह रहे हैं जो उनकी श्रेणी (Category) से कहीं बड़े हैं।

नियमतः विधायकों को डी या ई श्रेणी के आवास मिलते हैं, लेकिन कई पूर्व मंत्री जो अब सिर्फ विधायक हैं, वे अभी भी ‘बी’ और ‘सी’ श्रेणी के (74 बंगले और शिवाजी नगर स्थित) बड़े बंगलों में काबिज हैं।

इनमें अजय सिंह (राहुल भैया), संजय पाठक, सुरेंद्र पटवा और ओमप्रकाश सखलेचा जैसे नाम शामिल हैं।

इन नेताओं को अपनी पात्रता के अनुसार छोटे आवासों में शिफ्ट होना था, लेकिन इन्होंने ऊंचे दर्जे के बंगलों पर कब्जा बरकरार रखा है।

मोहन सरकार की यह सख्ती एक संदेश है कि सत्ता का लाभ केवल तब तक मिलना चाहिए जब तक व्यक्ति उस पद की जिम्मेदारी निभा रहा हो।

अब देखना यह होगा कि 13 जनवरी की समय सीमा के बाद क्या वास्तव में ‘बुलडोजर’ या प्रशासनिक बल इन बंगलों के द्वार तक पहुंचता है, या फिर रसूखदार नेता एक बार फिर समय की मोहलत लेने में कामयाब हो जाते हैं।

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