MP Ground Water Crisis: मध्यप्रदेश अपनी नदियों और प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है लेकिन आज यहां के लोग एक गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं।
केंद्र सरकार की ताजा ‘सलाना ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट 2024’ (अगस्त 2025 में साझा) ने एक डरावना खुलासा किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 55 में से 39 जिलों का भूजल (ग्राउंड वाटर) अब पीने योग्य नहीं रहा है।
समस्या पानी के गंदे दिखने की नहीं, बल्कि उसमें घुले नाइट्रेट की है, जो आंखों से दिखाई नहीं देता लेकिन शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है।
नाइट्रेट प्रदूषण में MP देश में दूसरे नंबर पर
यह बेहद चिंताजनक है कि भूजल में नाइट्रेट की अधिकता के मामले में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के बाद पूरे देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।
हाल ही में इंदौर में दूषित पानी के कारण हुई 20 मौतों ने इस खतरे की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।
इंदौर समेत राज्य के 39 जिलों में नाइट्रेट का स्तर तय मानक 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से कहीं अधिक पाया गया है।
किन जिलों पर मंडरा रहा है खतरा?
रिपोर्ट में जिन जिलों को ‘रेड जोन’ में रखा गया है, उनमें इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, धार, रतलाम, सागर, रीवा और सतना जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं।
इसके अलावा आगर मालवा, भिंड, छिंदवाड़ा, और शहडोल जैसे क्षेत्रों में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है।
इन इलाकों में एक या अधिक स्थानों पर पानी में जहर की सांद्रता जानलेवा स्तर तक पहुँच चुकी है।
आखिर पानी में जहर आया कहां से?
इस संकट के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण जिम्मेदार हैं:
- अत्यधिक रासायनिक खेती: धान और गेहूं की अधिक पैदावार के लिए किसान दशकों से यूरिया और अन्य नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। बारिश के पानी के साथ मिलकर ये रसायन जमीन के नीचे रिस जाते हैं और भूजल का हिस्सा बन जाते हैं।
- खराब सीवेज सिस्टम: शहरों का बढ़ता बोझ और दोषपूर्ण सीवेज निपटान व्यवस्था इसका दूसरा बड़ा कारण है। सेप्टिक टैंकों से होने वाला रिसाव सीधे तौर पर जमीन के अंदरूनी पानी को प्रदूषित कर रहा है।
- जलवायु परिवर्तन और गिरता जलस्तर: जब भूजल का पुनर्भरण (Recharge) कम होता है, तो पानी में मौजूद प्रदूषकों की मात्रा गाढ़ी (Concentrated) हो जाती है। कम पानी में ज्यादा नाइट्रेट होने से खतरा दोगुना हो गया है।
ऑक्सीजन की कमी और बीमारियां
नाइट्रेट जब शरीर में प्रवेश करता है, तो वह नाइट्राइट में बदल जाता है।
यह नाइट्राइट खून में मौजूद हीमोग्लोबिन से चिपक जाता है और उसकी ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता को खत्म कर देता है।
- ब्लू बेबी सिंड्रोम: इसका सबसे ज्यादा असर नवजात शिशुओं पर होता है। ऑक्सीजन की कमी से बच्चे का शरीर नीला पड़ने लगता है, जिसे ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ कहते हैं। यदि समय पर उपचार न मिले, तो यह जानलेवा हो सकता है।
- गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम: गर्भवती महिलाओं द्वारा ऐसा पानी पीने से गर्भस्थ शिशु के विकास पर असर पड़ता है और समय से पूर्व प्रसव की संभावना बढ़ जाती है।
- वयस्कों में लक्षण: बड़ों में लगातार सिरदर्द, थकान, सांस फूलना और पाचन तंत्र की गड़बड़ी इसके शुरुआती लक्षण हैं। लंबे समय तक इसका सेवन लिवर, किडनी और कैंसर जैसे गंभीर रोगों को जन्म दे सकता है।
सुरक्षा के उपाय और समाधान
प्रशासन को जहाँ सीवेज ट्रीटमेंट और जैविक खेती की दिशा में कड़े कदम उठाने होंगे, वहीं आम नागरिकों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है।
- अपने क्षेत्र के पानी की नियमित लैब जांच कराएं।
- नाइट्रेट हटाने के लिए उचित RO या विशेष ‘नाइट्रेट रिमूवल फिल्टर’ का उपयोग करें।
- बच्चों के लिए केवल प्रमाणित या सरकारी सप्लाई के सुरक्षित पानी का ही उपयोग करें।
समय आ गया है कि हम ‘साफ दिखने वाले’ और ‘शुद्ध’ पानी के बीच का अंतर समझें, वरना मध्यप्रदेश की अगली पीढ़ी एक बड़े स्वास्थ्य संकट की भेंट चढ़ सकती है।


