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टाइगर स्टेट पर संकट के बादल: MP में 2025 में 54 बाघों की मौत, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Tiger Deaths 2025: मध्य प्रदेश, जिसे ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है, आज एक डरावने दौर से गुजर रहा है।

जहां एक ओर देश में बाघों की बढ़ती संख्या का जश्न मनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के जंगलों से आ रही मौत की खबरें संरक्षण के दावों पर सवालिया निशान लगा रही हैं।

2025 वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए एक बुरा साल साबित हुआ है, जिसमें रिकॉर्ड 54 बाघों ने अपनी जान गंवाई है।

इस भयानक स्थिति को देखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अब कड़ा रुख अख्तियार किया है।

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हाईकोर्ट का हस्तक्षेप और सख्त निर्देश

भोपाल के प्रसिद्ध वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने व्यवस्था को आईना दिखाया है।

चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की पीठ ने इस मामले को केवल वन्यजीवों की हानि नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन की गंभीर विफलता माना है।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

कोर्ट की चिंता इस बात पर है कि अगर देश के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले टाइगर रिजर्व में ही बाघ सुरक्षित नहीं हैं, तो संरक्षण की पूरी नीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।

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सबसे बुरा साल: 2025 का मौत का आंकड़ा

साल 1973 में जब ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत हुई थी, तब उद्देश्य बाघों को विलुप्त होने से बचाना था।

लेकिन 2025 के आंकड़े बताते हैं कि हम पीछे की ओर जा रहे हैं।

1 जनवरी से 19 दिसंबर 2025 के बीच 54 बाघों की मौत किसी भी एक राज्य में एक वर्ष के भीतर दर्ज की गई सबसे बड़ी संख्या है।

यह ग्राफ साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है, 2021 में 34, 2022 में 43, और अब 2025 में 54।

यह आंकड़ा चेतावनी दे रहा है कि अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ‘टाइगर स्टेट’ का खिताब इतिहास की किताबों तक सीमित रह जाएगा।

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मौत के सौदागर: पोचिंग और इलेक्ट्रोक्यूशन

बाघों की मौत की वजहें प्राकृतिक कम और मानव-जनित ज्यादा हैं।

याचिका में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व का विशेष उल्लेख किया गया है, जहां लगभग 57 प्रतिशत मौतें अप्राकृतिक रही हैं।

शिकारियों द्वारा बिछाए गए फंदे, खेतों के आसपास अवैध बिजली के तार (करंट) और रेल-सड़क हादसे इन बेजुबानों के लिए काल बन रहे हैं।

हाल ही में उमरिया के चंदिया रेंज में मिला बाघ का शव इलेक्ट्रोक्यूशन (करंट लगना) का स्पष्ट उदाहरण है।

इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय पोचिंग नेटवर्क की सक्रियता ने आग में घी डालने का काम किया है।

इंटरपोल के रडार पर रहे तस्कर यांगचेन लखुंगपा की गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है कि बाघों के अंगों का व्यापार चीन, नेपाल और तिब्बत तक फैला एक संगठित अपराध है।

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विभाग की लापरवाही और जवाबदेही

हैरानी की बात यह है कि खुद वन विभाग के आला अधिकारी यह स्वीकार कर चुके हैं कि मैदानी अमले की लापरवाही और सुरक्षा में चूक इन मौतों की एक बड़ी वजह है।

टाइगर रिजर्व के भीतर बाघों के कंकाल मिलना यह दर्शाता है कि गश्त और निगरानी केवल कागजों तक सीमित है।

जब तक निचले स्तर के अधिकारियों और बीट गार्ड्स की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक शिकारियों के हौसले बुलंद रहेंगे।

अब सबकी निगाहें 11 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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