Uttarakhand Non Hindu Ban: उत्तराखंड, जिसे ‘देवभूमि’ भी कहा जाता हैं, इन दिनों एक बड़े धार्मिक और कानूनी बदलाव की दहलीज पर खड़ा है।
इसकी शुरुआत 16 जनवरी 2026 को हरिद्वार के पवित्र गंगा घाट ‘हर की पैड़ी’ से हुई, जहां अचानक रातों-रात कुछ बोर्ड लगा दिए गए।
इन बोर्डों पर स्पष्ट शब्दों में लिखा था— “हर की पैड़ी पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है।”
दिलचस्प बात यह है कि इन बोर्डों पर किसी खास संस्था का नाम नहीं था, बल्कि नीचे ‘आज्ञा से: म्युनिसिपल एक्ट हरिद्वार’ लिखा हुआ था।
हरिद्वार में हर की पैड़ी के आसपास ‘अ-हिंदू प्रवेश निषेध क्षेत्र’ के पोस्टर लगाए गए हैं। इन पोस्टरों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि इस क्षेत्र में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है।#Haridwar #HarKiPauri pic.twitter.com/ByGS1CWh09
— Molitics (@moliticsindia) January 16, 2026
इस एक कदम ने पूरे राज्य में एक नई बहस छेड़ दी है।
अब मांग केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं है, बल्कि केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री समेत उत्तराखंड के 47 प्रमुख तीर्थस्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।
क्या है 1916 का म्युनिसिपल एक्ट?
इस पूरी कवायद के केंद्र में 1916 का एक पुराना कानून है।
श्री गंगा सभा और चारधाम कमेटियों का दावा है कि हरिद्वार म्युनिसिपल एक्ट/बायलॉज में पहले से ही यह प्रावधान है कि तीर्थ क्षेत्र की पवित्रता बनाए रखने के लिए वहां केवल सनातन धर्म को मानने वालों का ही प्रवेश होना चाहिए।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी संकेत दिए हैं कि सरकार इस एक्ट का गहराई से अध्ययन कर रही है।
सरकार का रुख स्पष्ट है—जो भी निर्णय संत समाज और तीर्थ कमेटियां लेंगी, प्रशासन उस पर विचार करेगा।

‘इस्लाम का घर’ बनने का डर: गंगा सभा का पक्ष
हर की पैड़ी का प्रबंधन देखने वाली संस्था ‘श्री गंगा सभा’ के अध्यक्ष नितिन गौतम इस बैन को बेहद जरूरी मानते हैं।
उनका तर्क है कि यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि पुराने कानून को सख्ती से लागू करने की कोशिश है।
गौतम का कहना है कि उत्तराखंड की जनसांख्यिकी (Demography) तेजी से बदल रही है।
उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ विशेष समुदाय के लोग ‘भाईचारे’ की आड़ में तीर्थ क्षेत्रों में पैठ बना रहे हैं।
उनके अनुसार, “शुरुआत में ये लोग चाय की दुकानें, सैलून और फल की दुकानें खोलते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वहां धार्मिक विवाद और अपराध बढ़ने लगते हैं।”

उनका दावा है कि हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में बढ़ते अपराधों के पीछे यही बाहरी तत्व जिम्मेदार हैं।
वे इसे ‘दारुल इस्लाम’ बनाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा मानते हैं, जिसे रोकने के लिए प्रवेश पर पाबंदी अनिवार्य है।
चारधामों की तैयारी: कपाट खुलने से पहले बड़ा फैसला
सिर्फ हरिद्वार ही नहीं, बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) भी इसी रास्ते पर चल रही है।
समिति के अध्यक्ष और राज्यमंत्री हेमंत द्विवेदी ने साफ किया है कि बद्रीनाथ और केदारनाथ ‘पिकनिक स्पॉट’ नहीं हैं, बल्कि ये सनातन आस्था के सर्वोच्च केंद्र हैं।
द्विवेदी का कहना है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित वैदिक परंपराओं की रक्षा करना उनका धर्म है।
उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में केदारनाथ जैसे प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी अवैध मजारें और नमाज पढ़ने की खबरें सामने आई हैं, जो तीर्थ की मर्यादा के खिलाफ है।
प्रस्ताव तैयार है और उम्मीद है कि इस साल यात्रा शुरू होने (कपाट खुलने) से पहले औपचारिक बोर्ड लगा दिए जाएंगे।

वक्फ बोर्ड का चौंकाने वाला समर्थन
अमूमन ऐसे फैसलों का विरोध होता है, लेकिन उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के चेयरमैन शादाब शम्स ने इस मांग का समर्थन किया है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “जैसे मक्का और मदीना में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है क्योंकि वह इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल है, वैसे ही अगर हिंदू अपने तीर्थों की पवित्रता के लिए ऐसा नियम बना रहे हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।”
उन्होंने यहां तक कहा कि अगर किसी की आस्था हिंदू धर्म में इतनी गहरी है, तो वह धर्म परिवर्तन कर इन तीर्थों में जा सकता है।
रोजगार पर संकट: एक बड़ा सवाल
इस विवाद का दूसरा पहलू आर्थिक है। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा केवल धर्म का केंद्र नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। आंकड़ों के अनुसार:
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लगभग 12,000 से 15,000 लोग सीधे तौर पर यात्रा से जुड़े हैं (घोड़ा-खच्चर, पालकी, होटल स्टाफ)।
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अकेले केदारनाथ मार्ग पर 8,000 से ज्यादा रजिस्टर्ड ऑपरेटर हैं।
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इनमें एक बड़ी संख्या मुस्लिम श्रमिकों की है जो दशकों से तीर्थयात्रियों की सेवा कर रहे हैं।
अगर पूर्ण प्रतिबंध लागू होता है, तो गौरीकुंड से लेकर बद्रीनाथ तक के होटलों, रेस्टोरेंट और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में काम करने वाले हजारों लोगों की रोजी-रोटी छिन सकती है।
जानकारों का मानना है कि इससे यात्रा की व्यवस्थाओं पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि भारी वजन ढोने और खच्चर चलाने जैसे मुश्किल कामों में ये श्रमिक बड़ी भूमिका निभाते हैं।

आस्था और व्यवस्था के बीच का संघर्ष
फिलहाल, उत्तराखंड सरकार कानून के पन्ने पलट रही है और कमेटियां अपने बोर्ड तैयार कर रही हैं।
अगर यह प्रस्ताव कानून बन जाता है, तो उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा जहां इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक तीर्थस्थलों पर धार्मिक आधार पर प्रवेश प्रतिबंधित होगा।
यह फैसला आने वाले समय में न केवल राजनीति, बल्कि सामाजिक ताने-बाने और पर्यटन उद्योग को भी गहराई से प्रभावित करेगा।


