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देशभर में ओला-उबर और रैपिडो ड्राइवरों की हड़ताल, जानें क्या हैं मांगें? कैब मिलने में हो सकती है दिक्कत

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Ola Uber Strike: अगर आप आज यानी शनिवार को ऑफिस जाने, बाजार जाने या किसी जरूरी काम के लिए ओला, उबर या रैपिडो बुक करने की सोच रहे हैं, तो जरा ठहरिए!

आज आपको कैब या बाइक टैक्सी मिलने में पसीने छूट सकते हैं।

देशभर के लाखों गिग ड्राइवर्स (कैब और डिलीवरी पार्टनर्स) ने आज एक बड़ा विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है।

क्या है मामला?

तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) की अगुवाई में ड्राइवरों ने ‘ऑल इंडिया ब्रेकडाउन’ का आह्वान किया है।

इसके तहत ड्राइवर आज 6 घंटे तक अपने ऐप से ‘लॉग-आउट’ रहेंगे। यानी न वे सवारी उठाएंगे और न ही ऐप पर उपलब्ध दिखेंगे।

ड्राइवरों का कहना है कि वे लंबे समय से आर्थिक तंगी और कंपनियों की मनमानी नीतियों से परेशान हैं, और अब अपनी बात सुनाने का यही एक तरीका बचा है।

ड्राइवरों की दो प्रमुख मांगें क्या हैं?

ड्राइवरों ने इस बार अपनी लड़ाई को दो मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित किया है:

  1. न्यूनतम किराया तय हो (Minimum Base Fare): ड्राइवरों का आरोप है कि एग्रीगेटर कंपनियां (Ola, Uber आदि) अपनी मर्जी से किराया घटाती-बढ़ाती रहती हैं। कमीशन काटने के बाद ड्राइवरों के हाथ में बहुत कम पैसा बचता है। वे चाहते हैं कि सरकार एक ‘बेस रेट’ तय कर दे, जिससे कम में कोई भी राइड न हो। इससे उनकी कमाई में स्थिरता आएगी।
  2. निजी वाहनों के कमर्शियल उपयोग पर रोक: हालिया ‘मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025’ में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो निजी नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को भी कमर्शियल काम की इजाजत दे सकते हैं। कमर्शियल लाइसेंस वाले ड्राइवरों का कहना है कि उन्होंने भारी फीस और टैक्स भरकर पीली प्लेट ली है, ऐसे में प्राइवेट गाड़ियों को अनुमति देना उनके पेट पर लात मारने जैसा है।

गिग इकोनॉमी का कड़वा सच

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आंकड़े भी ड्राइवरों की इस बेबसी पर मुहर लगाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़कर 1.2 करोड़ पहुंच गई है, लेकिन इनमें से लगभग 40 प्रतिशत लोग महीने के 15 हजार रुपये भी नहीं कमा पाते।

महंगाई के दौर में इतनी कम कमाई में घर चलाना और गाड़ी का खर्चा निकालना ड्राइवरों के लिए नामुमकिन होता जा रहा है।

आप पर क्या असर होगा?

अगर आप दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में हैं, तो आज आपको ‘No Cabs Available’ का मैसेज बार-बार दिख सकता है।

अगर कैब मिल भी गई, तो ‘सर्ज प्राइसिंग’ के कारण आपको दोगुना-तिगुना किराया देना पड़ सकता है।

सलाह: अगर आज कहीं जाना बहुत जरूरी है, तो मेट्रो, ऑटो या बस जैसे वैकल्पिक साधनों का इस्तेमाल करें। घर से थोड़ा जल्दी निकलें ताकि कैब न मिलने की स्थिति में आप परेशान न हों।

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