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डिजिटल दुनिया का नियम: ‘बुरा मत टाइप करो, बुरा मत शेयर करो’- प्रो. संजय द्विवेदी

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Digital Media and Youth: नई दिल्ली। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने युवाओं को डिजिटल माध्यमों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने की सलाह दी है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया इंसानी जिंदगी को आसान बनाने का एक साधन मात्र है, इसे जीवन का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए।

युवा वर्ग तकनीक को सिर्फ मनोरंजन तक सीमित न रखे, बल्कि इसका उपयोग ज्ञान-सृजन, शिक्षा, रोजगार और संवाद के दायरे को बढ़ाने के लिए करे।

साहित्य, कला और संस्कृति को समर्पित संस्था ‘साहित्यायन’ की पहली ऑनलाइन व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि आज का दौर वर्नाकुलर, वॉइस और वीडियो (3Vs) का है।

डिजिटल क्रांति ने भारतीय भाषाओं के लिए नए दरवाजे खोले हैं।

भाषा की बंदिशें खत्म होने से अब हमारा साहित्य, कला और सिनेमा दुनिया भर के मंचों पर पहुंच रहा है।

मीडिया साक्षरता और डिजिटल अनुशासन

प्रो. द्विवेदी ने मीडिया साक्षरता पर जोर देते हुए एक नया सूत्र दिया—“बुरा मत टाइप करो, बुरा मत लाइक करो और बुरा मत शेयर करो।”

उन्होंने कहा कि वायरल होने वाली हर जानकारी सच नहीं होती। किसी भी खबर या वीडियो को आगे भेजने से पहले उसकी प्रामाणिकता जरूर जांचें।

असहमति जताने का अधिकार सबको है, लेकिन सोशल मीडिया पर नफरत, अफवाह और किसी का अपमान करना गलत डिजिटल व्यवहार है।

AI और डीपफेक की चुनौतियां

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि AI ने अनुवाद, भाषा-परिष्कार और कंटेंट क्रिएशन में नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इससे इंसानी रचनात्मकता और मौलिक चिंतन के सामने खतरा भी खड़ा हुआ है।

डीपफेक और नकली सामग्री के इस दौर में अब स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षा तक ‘मीडिया लिटरेसी’ को सिलेबस का हिस्सा बनाना बहुत जरूरी हो गया है।

मानवीय संवेदनाओं का महत्व समझाते हुए उन्होंने अकबर इलाहाबादी का शेर उद्धृत किया—“दर्द को दिल में जगह दो अकबर, इल्म से शायरी नहीं होती।”

उन्होंने कहा कि कितनी भी आधुनिक तकनीक आ जाए, लेकिन जब तक उसमें मानवीय भावनाएं और संघर्ष शामिल नहीं होंगे, तब तक कोई भी रचना असरदार नहीं बन सकती।

कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्यायन के संरक्षक और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हरीश अरोड़ा ने संस्था के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ‘साहित्यायन’ भाषा, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आगे भी ऐसे ऑनलाइन और ऑफलाइन संवाद आयोजित करता रहेगा।

कार्यक्रम का संचालन अविरल अभिलाष मिश्र ने किया तथा आयोजन समिति के सदस्यों का विशेष योगदान रहा।

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