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RSS का ‘मिशन 2027’: 100 साल में दूसरी बार बदलेगा संघ का ढांचा, खत्म होगा प्रांत प्रचारक का पद

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

RSS New Structure Changes: दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने काम करने के तरीके और सांगठनिक ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन करने की तैयारी में है।

40 लाख से अधिक स्वयंसेवकों और 83 हजार से ज्यादा शाखाओं वाले इस संगठन ने तय किया है कि अब वह ‘पुराने ढर्रे’ को छोड़कर नए जमाने की जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालेंगे।

इस बदलाव की सबसे बड़ी खबर यह है कि संघ की रीढ़ माने जाने वाले ‘प्रांत प्रचारक’ के पद को समाप्त किया जा रहा है।

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100 साल में दूसरा सबसे बड़ा बदलाव

संघ के इतिहास में यह बदलाव ऐतिहासिक है।

  • इससे पहले इतना बड़ा नीतिगत बदलाव साल 1949 में देखा गया था, जब संघ ने अपना लिखित संविधान बनाया था और राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को स्वीकार किया था।
  • उसके बाद समय-समय पर ड्रेस (हाफ पैंट से फुल पैंट) जैसे बदलाव तो हुए, लेकिन संगठन के बुनियादी ढांचे (Hierarchy) को नहीं छेड़ा गया था।

अब लगभग 77 साल बाद संघ फिर से अपनी जड़ों को मजबूत करने के लिए स्ट्रक्चर बदल रहा है।

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क्या है नया स्ट्रक्चर? (प्रांत से राज्य की ओर)

वर्तमान व्यवस्था में संघ ने देश को कई ‘प्रांतों’ में बांट रखा है।

उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ही 6 अलग-अलग प्रांत (ब्रज, अवध, मेरठ, कानपुर, काशी और गोरक्ष) हैं और हर प्रांत का अपना एक ‘प्रांत प्रचारक’ होता है।

नई योजना के तहत:

  • राज्य प्रचारक: अब अलग-अलग प्रांत प्रचारकों की जगह पूरे राज्य के लिए केवल एक ‘राज्य प्रचारक’ होगा। यानी उत्तर प्रदेश में अब 6 की जगह 1 मुख्य प्रचारक होगा।

  • क्षेत्रों में कटौती: अभी पूरे देश में 11 ‘क्षेत्र’ हैं, जिन्हें घटाकर 9 करने का प्रस्ताव है। इससे ऊपर के अधिकारियों की संख्या कम होगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी।

  • डिसेंट्रलाइजेशन (विकेंद्रीकरण): संघ का मानना है कि ऊपर के पदों पर भीड़ कम करके जमीनी स्तर पर ताकत बढ़ानी चाहिए।

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संभाग स्तर पर बढ़ेगी ताकत

भले ही ऊपर के पदों को कम किया जा रहा हो, लेकिन मध्यम स्तर यानी ‘संभाग’ (Division) को बेहद शक्तिशाली बनाया जा रहा है।

  • अब दो प्रशासनिक मंडलों को मिलाकर एक ‘संभाग’ बनाया जाएगा।

  • उत्तर प्रदेश के 18 मंडलों को 9 संभागों में बांटा जाएगा, जहां 9 ‘संभाग प्रचारक’ तैनात होंगे।

  • इन संभाग प्रचारकों का सीधा संपर्क जिले, तहसील और गांव के कार्यकर्ताओं से होगा। पहले कार्यकर्ताओं को अपनी बात ऊपर तक पहुंचाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, लेकिन अब ‘संभाग प्रचारक’ उनके लिए सीधे मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे।

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निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को ‘पावर’

इस पूरी कवायद का असली उद्देश्य “जमीनी कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना” है।

संघ के सूत्रों का कहना है कि अब जिला, ब्लॉक और गांव स्तर के कार्यकर्ता केवल आदेशों का पालन नहीं करेंगे, बल्कि वे अपने क्षेत्र की समस्याओं और मुद्दों का विश्लेषण करके खुद लक्ष्य (Target) तय करेंगे।

अब तक गांव या जिले के कार्यकर्ता को किसी भी छोटे-बड़े फैसले या प्रस्ताव के लिए प्रांत प्रचारक की मंजूरी का इंतजार करना पड़ता था।

भौगोलिक दूरी और पद का प्रोटोकॉल बाधा बनता था। नई व्यवस्था में ‘संभाग प्रचारक’ कार्यकर्ताओं के करीब होंगे, जिससे संवाद पारदर्शी होगा और काम में तेजी आएगी।

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यूपी चुनाव का ‘लिटमस टेस्ट’

इस बड़े बदलाव का प्रस्ताव 13 से 15 मार्च के बीच हरियाणा के पानीपत (समालखा) में होने वाली संघ की बैठक में रखा जाएगा। इसके बाद:

  1. सितंबर 2026: सभी सुझावों को शामिल कर प्रस्ताव पारित किया जाएगा।

  2. जनवरी-फरवरी 2027: इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा।

  3. यूपी चुनाव 2027: इस नए स्ट्रक्चर की सबसे पहली और बड़ी परीक्षा उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनावों में होगी। संघ यहाँ ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ के साथ उतरेगा, जहाँ हर छोटे क्षेत्र की जिम्मेदारी सीधे स्थानीय कार्यकर्ताओं के हाथ में होगी।

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बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

संघ के पदाधिकारियों का मानना है कि संगठन को अब ‘रिजल्ट ओरिएंटेड’ (परिणामों पर केंद्रित) होना पड़ेगा।

आज के दौर में जब सूचनाएं तेजी से बदलती हैं, तो संगठन का ढांचा भी लचीला और तेज होना चाहिए।

यह एक तरह का ‘कॉर्पोरेट डिसेंट्रलाइजेशन’ जैसा है, जहां फील्ड पर काम करने वाले व्यक्ति को निर्णय लेने का अधिकार दिया जाता है।

संघ का लक्ष्य है कि देश के हर व्यक्ति तक अपनी पहुंच बनाई जाए और इसके लिए संगठन का ‘हल्का’ और ‘फुर्तीला’ होना जरूरी है।

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RSS का यह नया अवतार न केवल उसकी आंतरिक कार्यप्रणाली को बदलेगा, बल्कि भारतीय राजनीति और सामाजिक ताने-बने पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा।

बड़े पदों को कम कर जमीनी पकड़ मजबूत करने की यह रणनीति 2027 के चुनावों में कितनी कारगर होती है, यह देखने वाली बात होगी।

लेकिन इतना तय है कि संघ अब अपने ‘शताब्दी वर्ष’ की ओर एक नई ऊर्जा और नए ढांचे के साथ बढ़ रहा है।

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