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अब FIR से अदालती फैसलों तक, महिलाओं के लिए नहीं होगा ‘चरित्रहीन’ और ‘रखैल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल; जानिए नए नियम

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

New Gender Guidebook: भारत की न्यायिक और पुलिस व्यवस्था में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है।

देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं से जुड़े मामलों में इस्तेमाल होने वाली भाषा को पूरी तरह बदलने का फैसला किया है।

इसके लिए कोर्ट ने एक नई ‘जेंडर गाइडबुक’ (लैंगिक संवेदनशीलता मार्गदर्शिका) के ड्राफ्ट को अपनी मंजूरी दे दी है।

इस फैसले के बाद अब देश की किसी भी अदालत के फैसले में या पुलिस की एफआईआर (FIR) और चार्जशीट में महिलाओं के लिए किसी भी तरह के अपमानजनक या रूढ़िवादी शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकेगा।

अब कोर्ट और थानों में महिलाओं को मिलेगा पूरा सम्मान

इस नई गाइडबुक को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित ‘नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी’ (NJA) में तैयार किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने इस पूरी मुहिम का नेतृत्व किया और उनकी देखरेख में ही इसे अंतिम रूप दिया गया।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने देश की सभी अदालतों और पुलिस थानों को इस नई गाइडलाइन का सख्ती से पालन करने के निर्देश जारी किए हैं।

कानून के जानकारों का मानना है कि यह कदम सिर्फ शब्दों का बदलाव नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी पुरुषवादी और रूढ़िवादी सोच को बदलने का एक गंभीर प्रयास है।

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रखैल’ और ‘चरित्रहीन’ जैसे अपमानजनक शब्द अब इतिहास

अक्सर देखा जाता था कि अदालती कार्यवाहियों या पुलिस थानों में महिलाओं के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया जाता था, जो उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते थे।

नई गाइडबुक ने इन सभी शब्दों को कानूनी दस्तावेजों से हमेशा के लिए बाहर कर दिया है।

उदाहरण के लिए, अब तक कानूनी बहसों में इस्तेमाल होने वाले शब्द जैसे ‘प्रोस्टीट्यूट’ या ‘कॉल गर्ल’ की जगह ‘सेक्स वर्कर’ शब्द का उपयोग किया जाएगा।

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इसी तरह समाज में अपमानजनक माने जाने वाले शब्द ‘रखैल’ को हटाकर अब ‘पार्टनर’ शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा।

जानिए नए नियमों में क्या बदलेगा

बदलाव का यह दायरा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।

अदालत में पीड़ित महिला को अक्सर ‘प्रॉसीक्यूट्रिक्स’ या ‘असहाय महिला’ कहकर संबोधित किया जाता था, लेकिन अब उन्हें ‘पीड़ित’, ‘शिकायतकर्ता’ या ‘सर्वाइवर’ कहा जाएगा।

इसके अलावा, पुराने समय से चले आ रहे मुहावरे जैसे ‘शीलभंग करना’ को अब पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है; इसकी जगह अब ‘यौन हमला’ या ‘शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन’ जैसे गंभीर और गरिमापूर्ण शब्दों का प्रयोग होगा।

सबसे बड़ा प्रहार ‘चरित्रहीन’ (Characterless) शब्द पर किया गया है।

अब अदालतों में किसी भी महिला को चरित्रहीन नहीं कहा जा सकेगा।

  • नए नियमों के मुताबिक, किसी भी पीड़िता के कपड़ों, उसके पुराने इतिहास या उसके रहन-सहन के आधार पर उसके चरित्र पर सवाल उठाना पूरी तरह से गैर-कानूनी और अप्रासंगिक माना जाएगा।
  • बच्चों से जुड़े मामलों में भी संवेदनशीलता बरतते हुए ‘सिखाया गया बच्चा’ (Tutored Child) जैसे शब्दों को हटाकर ‘बाल गवाह’ या ‘नाबालिग पीड़ित’ लिखा जाएगा।
  • समलैंगिकता के संदर्भ में भी ‘होमोसेक्सुअल’ की जगह पुरुषों के लिए ‘गे’ और महिलाओं के लिए ‘लेस्बियन’ शब्दों का स्पष्ट और सम्मानजनक इस्तेमाल होगा।

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टू-फिंगर टेस्ट पर पूर्ण प्रतिबंध 

इस नई गाइडबुक में केवल शब्दों को ही नहीं बदला गया है, बल्कि कानूनी प्रक्रियाओं को भी ज्यादा मानवीय और संवेदनशील बनाया गया है।

बलात्कार जैसे संगीन मामलों में होने वाले ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से रोक लगा दी है।

अदालत का साफ कहना है कि यह टेस्ट वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह गलत, अप्रासंगिक और किसी भी महिला की निजता व गरिमा के खिलाफ है।

महिला अधिकार संगठन सालों से इस दर्दनाक और अपमानजनक टेस्ट को बंद करने की मांग कर रहे थे, जिसे अब कानूनी रूप से अमलीजामा पहना दिया गया है।

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गवाहों को ‘अतिथि’ का दर्जा

इसके साथ ही, अदालत में आने वाले गवाहों की सुरक्षा और सम्मान को लेकर भी नए नियम तय किए गए हैं।

अक्सर अदालतों में गवाहों से ऐसे तीखे और डराने वाले सवाल पूछे जाते थे जिससे वे परेशान हो जाते थे।

अब नई गाइडबुक कहती है कि गवाहों के साथ कोर्ट में ‘अतिथि’ (मेहमान) की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए और उनसे सम्मानपूर्वक पूछताछ की जानी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति सच बोलने के लिए अदालत आने से न डरे।

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पांच विशेषज्ञों ने तैयार किया यह ऐतिहासिक ड्राफ्ट

इस ऐतिहासिक ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए पांच सदस्यों की एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी।

जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली इस समिति में गुजरात हाई कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सोनिया गोकानी, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सूरत सिंह, प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रो. लूसी जेवलो और मध्य प्रदेश कैडर की पूर्व तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी अनुराधा शंकर सिंह शामिल थीं।

इस समिति की सबसे खास बात यह रही कि इसके दो प्रमुख सदस्यों का सीधा संबंध भोपाल से रहा है, जिसने इस पूरे मसौदे को व्यावहारिक जमीन पर तैयार करने में मदद की।

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पुरानी हैंडबुक को बदलने की क्यों पड़ी जरूरत?

आपको बता दें कि इससे पहले अगस्त 2023 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर पहली हैंडबुक लाई गई थी।

हालांकि, समय के साथ यह महसूस किया गया कि वह हैंडबुक बहुत ज्यादा तकनीकी और किताबी (अकादमिक) थी, जिसे जमीनी स्तर पर काम करने वाले पुलिस कांस्टेबलों या आम नागरिकों के लिए समझना बेहद मुश्किल था।

इसके अलावा, पुरानी हैंडबुक में कुछ ऐसी विवादित टिप्पणियां भी शामिल हो गई थीं, जिनमें कहा गया था कि प्रभावशाली जातियों के पुरुष अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए यौन हिंसा का सहारा लेते हैं।

इस विवादित हिस्से को नए ड्राफ्ट से पूरी तरह हटा दिया गया है।

साथ ही, कानून में पुराने सांस्कृतिक मुहावरों जैसे “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” (जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता वास करते हैं) को भी हटा दिया गया है।

कोर्ट का मानना है कि महिलाओं को देवी का दर्जा देकर खोखली प्रशंसा करने के बजाय, उन्हें संविधान द्वारा दिए गए वास्तविक कानूनी अधिकार और एक सुरक्षित माहौल देना ज्यादा जरूरी है।

देशभर के महिला संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस नए बदलाव का दिल खोलकर स्वागत किया है।

उनका कहना है कि थानों और अदालतों की भाषा बदलने से पीड़िताओं के मन से कानून का डर खत्म होगा और समाज में एक सकारात्मक संदेश जाएगा।

अब देखना यह है कि देश की निचली अदालतें और स्थानीय पुलिस थाने इस ऐतिहासिक व्यवस्था को कितनी जल्दी अपने काम का हिस्सा बनाते हैं।

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