Supreme Court on Maternity Leave: सुप्रीम कोर्ट ने 17 मार्च, मंगलवार को बच्चा गोद लेने वाली कामकाजी महिलाओं के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मातृत्व (Motherhood) का आनंद और उसकी जिम्मेदारी केवल बच्चे को जन्म देने तक सीमित नहीं है।
अब उन महिलाओं को भी पूरा मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) मिलेगा जो बच्चा गोद लेती हैं, चाहे उस बच्चे की उम्र 3 महीने से ज्यादा ही क्यों न हो।

क्या था विवाद और पुराना कानून?
अब तक देश में ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020’ (Social Security Code 2020) की धारा 60(4) के तहत यह नियम यह था कि अगर कोई कामकाजी महिला 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती है, तभी वह 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव की हकदार होगी।
लेकिन अगर बच्चा 3 महीने से एक दिन भी बड़ा हुआ, तो मां को कोई कानूनी छुट्टी नहीं मिलती थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी ‘3 महीने की समय सीमा’ को असंवैधानिक करार दिया है।
The Supreme Court has ruled that Section 60(4) of the Code on Social Security, 2020, that allowed adoptive mothers to avail 12 weeks’ maternity leave only if the adopted child was below three-months of age is unconstitutional and violative of the Right to Equality.
A bench of…
— ANI (@ANI) March 17, 2026
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि यह नियम समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और सम्मान से जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी और महत्वपूर्ण बातें
कोर्ट ने इस फैसले के दौरान कुछ ऐसी बातें कहीं जो समाज की सोच बदलने वाली हैं:
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जैविक बनाम दत्तक: कोर्ट ने कहा कि परिवार बनाने के लिए केवल ‘बायोलॉजी’ (जन्म देना) ही एकमात्र रास्ता नहीं है। गोद लेना भी उतना ही कानूनी और पवित्र तरीका है। कानून की नजर में ‘गोद लिया बच्चा’ और ‘जैविक बच्चा’ बिल्कुल समान हैं।
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जिम्मेदारी समान है: कोर्ट का तर्क बहुत सीधा था—अगर एक महिला 3 महीने से बड़े बच्चे को घर लाती है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी कम हो जाती है? बिल्कुल नहीं। बल्कि बड़े बच्चे को नए माहौल में ढालने के लिए मां को और भी ज्यादा समय और जुड़ाव की जरूरत होती है।
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प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy): कोर्ट ने कहा कि एक महिला का यह अधिकार कि वह बच्चा कैसे पैदा करना चाहती है या परिवार कैसे बढ़ाना चाहती है, इसमें गोद लेना भी शामिल है। इसे किसी समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता।
Importantly, the Court recognised adoption as part of reproductive autonomy under Article 21 — placing it on equal footing with biological motherhood
— Bar and Bench (@barandbench) March 17, 2026
मामला अदालत तक कैसे पहुंचा?
यह पूरी कानूनी लड़ाई कर्नाटक की एक वकील हमसानंदिनी नंदूरी की वजह से मुमकिन हो पाई।
उन्होंने 2021 में एक याचिका दायर की थी। नंदूरी खुद एक दत्तक मां (Adoptive Mother) बनी थीं।
उन्होंने दो भाई-बहनों को गोद लिया था जिनकी उम्र 2 और 4 साल थी।
जब उन्होंने अपने दफ्तर से छुट्टी मांगी, तो उन्हें यह कहकर मना कर दिया गया कि बच्चे 3 महीने से बड़े हैं।
उन्होंने इस भेदभाव को अदालत में चुनौती दी और लंबी लड़ाई के बाद आज देश की लाखों महिलाओं के लिए रास्ता साफ कर दिया।
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The Supreme Court on Tuesday held that denying maternity leave to women adopting children above three months was unconstitutional,… pic.twitter.com/AfZhXP6w6T
— IndiaToday (@IndiaToday) March 17, 2026
पैटर्निटी लीव पर भी बड़ी टिप्पणी
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केवल माताओं की ही बात नहीं की, बल्कि पिताओं के हक पर भी ध्यान दिया।
कोर्ट ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वे ‘पितृत्व अवकाश’ (Paternity Leave) को लेकर भी एक ठोस कानून बनाने पर विचार करें।
कोर्ट का मानना है कि बच्चे की परवरिश केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है, इसमें पिता की भूमिका भी उतनी ही अहम है।

भारत में वर्तमान में क्या हैं मैटरनिटी लीव के नियम?
आम तौर पर, भारत में महिला कर्मचारियों को 26 सप्ताह (करीब 6 महीने) की पेड मैटरनिटी लीव मिलती है।
हालांकि, गोद लेने वाली माताओं के लिए यह समय सीमा 12 सप्ताह थी, जो अब उम्र की पाबंदी हटने के बाद अधिक सुलभ हो जाएगी।
कौन ले सकता है यह छुट्टी?
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महिला कर्मचारी ने पिछले 12 महीनों में कम से कम 80 दिन काम किया हो।
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यह नियम सरकारी और प्राइवेट दोनों सेक्टर की महिलाओं पर लागू होता है।

एक प्रगतिशील समाज की ओर कदम
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि कानून को समय के साथ बदलना चाहिए।
“मातृत्व एक मौलिक मानवाधिकार है”, कोर्ट की यह टिप्पणी उन सभी महिलाओं के लिए सम्मान की बात है जो गोद लेकर किसी बच्चे को नया जीवन देती हैं।
अब किसी भी ‘यशोदा’ को अपने बच्चे के साथ समय बिताने के लिए दफ्तर की फाइलों और कानूनी पेचीदगियों के बीच नहीं झूलना पड़ेगा।
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