Female Genital Mutilation: सुप्रीम कोर्ट ने ‘महिला खतना’ (Female Genital Mutilation- FGM) की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर एक बार फिर से सुनवाई शुरू की है।
कोर्ट ने इस मामले को ‘गंभीर’ बताते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यह मामला नाबालिग बच्चियों के संवैधानिक अधिकारों और उनके शारीरिक स्वत्रंता से जुड़ा हुआ है।
याचिका का आधार: POCSO का उल्लंघन और धार्मिक जबरदस्ती
यह याचिका ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी’ नामक एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) द्वारा दायर की गई है।
याचिका में मुख्य रूप से तीन बड़े दावे किए गए हैं:
- POCSO एक्ट का सीधा उल्लंघन: याचिका में कहा गया है कि किसी नाबालिग बच्ची के जननांगों को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना, काटना या उनमें कोई छेड़छाड़ करना, POCSO (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट) के तहत एक गंभीर अपराध है। चूंकि खतना आमतौर पर नाबालिग लड़कियों का ही किया जाता है, इसलिए यह कानून का सीधा-साधा उल्लंघन है।
- इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं: याचिकाकर्ताओं का दावा है कि महिला खतना इस्लाम धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं है। न तो कुरान में इसका स्पष्ट उल्लेख है और न ही यह किसी मूल धार्मिक ग्रंथ में शामिल है। फिर भी, इसे एक धार्मिक रिवाज़ के रूप में थोपा जा रहा है।
- संवैधानिक और मानवाधिकारों का हनन: यह प्रथा बच्चियों के जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21), गरिमा के साथ जीने के अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 15) का gross उल्लंघन करती है।
The #SupremeCourt on Friday agreed to examine a plea to ban the practice of #femalegenitalmutilation (#FGM) or #femalecircumcision prevailing among #Muslims, especially in the #DawoodiBohra community. https://t.co/SHnjHY19wi
— Deccan Herald (@DeccanHerald) November 29, 2025
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया सुनवाई को महत्व?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह “बच्चों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा एक गंभीर मामला है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।”
कोर्ट का यह रवैया दर्शाता है कि वह धार्मिक प्रथाओं के नाम पर की जा रही ऐसी कुरीतियों को बर्दाश्त नहीं करने वाला है जो बच्चों के कल्याण और अधिकारों के विरुद्ध हों।

महिला खतना क्यों है खतरनाक? WHO और UN की चेतावनी
महिला खतना को लेकर दुनिया भर की स्वास्थ्य संस्थाएं लगातार आगाह करती रही हैं।
- शारीरिक नुकसान: इस प्रक्रिया के तहत महिलाओं के बाहरी जननांगों के एक हिस्से को आंशिक या पूरी तरह से काट दिया जाता है। इससे दर्द, हैवी ब्लीडिंग (अत्यधिक रक्तस्राव), संक्रमण और यूरिन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
- दीर्घकालिक प्रभाव: इसके कारण यौन संबंध के दौरान दर्द, मासिक धर्म में गंभीर समस्याएं, प्रसव के दौरान जटिलताएं और नसों में चोट जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
- मानसिक आघात: यह प्रक्रिया बच्ची के मन पर गहरा मनोवैज्ञानिक आघात छोड़ती है, जिससे वह आजीवन पीड़ित रह सकती है। चिंता, अवसाद और PTSD (पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) जैसी समस्याएं होना आम बात है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने महिला खतना को “लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन” करार दिया है।
संयुक्त राष्ट्र भी लगातार दुनिया के सभी देशों से इस प्रथा को खत्म करने का आह्वान करता रहा है।
#SupremeCourt seeks Centre’s response on plea to ban female genital mutilation practiced among some #Muslims, calling it a rights violation.#FemaleGenitalMutilation
https://t.co/hPPjqIUPi2 pic.twitter.com/ivxySoIpvw
— Afternoon Voice (@Afternoon_Voice) November 29, 2025
केंद्र सरकार का पहले का रुख और आगे की राह
यह पहली बार नहीं है जब यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।
साल 2018 में भी ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई हुई थी, जिसमें केंद्र सरकार ने कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा था कि “धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना एक अपराध है और सरकार इस पर रोक का समर्थन करती है।”
सरकार ने यह भी कहा था कि ऐसे कृत्यों के लिए दंड विधान (Indian Penal Code, अब BNS) में सात साल तक की कैद का प्रावधान मौजूद है।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा नोटिस के बाद, यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इस मामले में क्या जवाब देती है और क्या वह इस प्रथा पर स्पष्ट रूप से रोक लगाने के लिए एक विशिष्ट कानून बनाने पर विचार करती है, जैसा कि अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में है।
महिला खतना का मुद्दा सिर्फ एक धार्मिक या सामाजिक प्रथा का सवाल नहीं है, बल्कि यह नाबालिग बच्चियों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मौलिक अधिकारों से जुड़ा एक गंभीर मानवीय संकट है।


