Supreme Court on Rape Attempt: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया है, जिसने देश में हलचल मचा दी थी।
देश की शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी बच्ची या महिला के ब्रेस्ट को पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा खींचना केवल छेड़छाड़ या ‘अपराध की तैयारी’ नहीं, बल्कि बलात्कार का प्रयास (Attempt to Rape) है।
आइए जानते हैं क्या था ये पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर इतनी कड़ी आपत्ति क्यों जताई।
पायजामा नाड़ा खींचना = रेप की कोशिश! सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद HC का विवादित फैसला पलटा। 14 साल की लड़की के ब्रेस्ट पकड़ने, नाड़ा खींचने और घसीटने को सिर्फ “तैयारी” नहीं, बल्कि रेप की कोशिश माना। HC को फटकार, POCSO के कड़े आरोप बहाल! न्याय की बड़ी जीत! #SupremeCourt #POCSO pic.twitter.com/fvMQCjwhOm
— United Bharat (@UnitedBharatUP) February 18, 2026
क्या था पूरा मामला?
यह घटना 10 नवंबर 2021 की है। एक महिला अपनी 14 साल की नाबालिग बेटी के साथ रिश्तेदारी से घर लौट रही थी।
रास्ते में गांव के ही तीन आरोपी (पवन, आकाश और अशोक) मिले और उन्होंने लिफ्ट देने के बहाने बच्ची को बाइक पर बैठा लिया।
रास्ते में आरोपियों ने सुनसान जगह पर बाइक रोकी और नाबालिग के साथ बदसलूकी शुरू कर दी।
आरोप है कि आरोपियों ने बच्ची को पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश की और उसके पायजामे का नाड़ा खोल दिया।
बच्ची के शोर मचाने पर जब आसपास के लोग पहुंचे, तो आरोपी वहां से भाग निकले।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित तर्क
इस मामले में निचली अदालत ने आरोपियों को रेप की कोशिश (IPC की धारा 376/511) के तहत समन भेजा था।
इसके खिलाफ आरोपी इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच गए।
17 मार्च 2025 को जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पायजामे का नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ना केवल ‘रेप की तैयारी’ है, ‘रेप की कोशिश’ नहीं।
हाई कोर्ट ने इस अपराध की गंभीरता को कम करते हुए इसे केवल छेड़छाड़ या शील भंग करने के दायरे में रखा था।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “कानून का गलत इस्तेमाल”
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वत संज्ञान लिया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया।
कोर्ट ने अपनी सुनवाई में कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें कहीं:
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सहानुभूति जरूरी: कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसला सुनाते समय कानूनी बारीकियों के साथ-साथ पीड़ित के प्रति सहानुभूति रखना भी जरूरी है।
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तैयारी और कोशिश में अंतर: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आरोपी ने बच्ची को घसीटा और उसके कपड़ों (नाड़े) के साथ जबरदस्ती की, तो वह ‘तैयारी’ के चरण को पार कर चुका था। यह सीधे तौर पर अपराध करने की ‘कोशिश’ थी।
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कड़े चार्ज: कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को “क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस (आपराधिक न्यायशास्त्र) के सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल” बताया और आरोपियों के खिलाफ POCSO एक्ट और रेप की कोशिश की धाराओं को दोबारा बहाल कर दिया।

फैसले का महत्व
यह फैसला समाज में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है।
यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो कानूनी बारीकियों का फायदा उठाकर गंभीर अपराधों से बचने की कोशिश करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को ‘हल्के’ में न लिया जाए।
नोट: अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाना और शारीरिक रूप से जबरदस्ती करना केवल “तैयारी” नहीं हो सकता, यह उस भयानक अपराध की शुरुआत है जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।


