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“कुत्तों से प्रेम है तो उन्हें घर ले जाएं, मासूमों की जान जोखिम में न डालें”- स्ट्रीट डॉग्स पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 13 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Supreme Court on Stray Dogs भारत में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और उनसे होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर मासूम बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने उन लोगों को भी आड़े हाथों लिया जो सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाते हैं लेकिन उनकी जिम्मेदारी नहीं लेते।

“वायरस लाइलाज है, खतरा बड़ा है”

कोर्ट ने कहा कि कुत्तों में एक विशेष प्रकार का वायरस होता है जो न केवल इंसानों बल्कि वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा है।

रणथंभौर नेशनल पार्क का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने बताया कि वहां बाघों में कुत्तों के काटने से एक ऐसी बीमारी फैली जिसका कोई इलाज नहीं है।

कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब एक 9 साल का मासूम बच्चा कुत्ते के हमले का शिकार होता है, तो उसकी पीड़ा का जवाबदेह कौन है?

क्या वह संस्थाएं जो केवल खाना खिलाकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं?

कोर्ट ने दो टूक कहा— “अगर आपको कुत्तों से इतना ही प्रेम है, तो उन्हें अपने घर ले जाएं और उनकी पूरी जिम्मेदारी उठाएं।”

मुआवजे और जवाबदेही पर सख्त निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को चेतावनी दी है कि अब कुत्तों के काटने से होने वाली हर मौत या चोट के लिए सरकार को भारी मुआवजा देना होगा।

कोर्ट ने कहा कि वह दिन दूर नहीं जब उन संगठनों और व्यक्तियों पर भी जवाबदेही तय की जाएगी जो कुत्तों को खाना खिलाते हैं लेकिन उनके व्यवहार और उनसे होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी नहीं लेते।

सार्वजनिक स्थानों पर ‘नो एंट्री’

सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कोर्ट के 7 नवंबर के आदेश का समर्थन करते हुए कहा कि स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बस डिपो और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील स्थानों पर एक भी आवारा कुत्ता नहीं होना चाहिए।

उन्होंने लद्दाख का हवाला देते हुए बताया कि वहां 55,000 आवारा कुत्तों के कारण वन्यजीवों की 9 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।

कोर्ट ने सहमति जताई कि एयरपोर्ट और अन्य सार्वजनिक संस्थानों में इंसानों के आने-जाने का अधिकार है, वहां जानवरों को रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

वकीलों और डॉग लवर्स को फटकार

सुनवाई के दौरान जस्टिस मेहता ने एक घटना का जिक्र करते हुए नाराजगी जताई कि गुजरात में जब नगर निगम के कर्मचारी कुत्तों को पकड़ने गए, तो वहां वकीलों ने ही उन पर हमला कर दिया।

कोर्ट ने इसे ‘तथाकथित कुत्ता प्रेम’ करार दिया।

इससे पहले की सुनवाई में जब अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के वकील ने एक ‘शांत’ कुत्ते का उदाहरण देना चाहा, तो कोर्ट ने उन्हें टोकते हुए कहा कि कुत्तों को ‘महान’ साबित करने की कोशिश न करें, समस्या की गंभीरता को समझें।

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अदालती आदेशों का घटनाक्रम

यह मामला पिछले कई महीनों से चर्चा में है।

अगस्त 2025 में कोर्ट ने पहली बार कुत्तों को शेल्टर होम भेजने का आदेश दिया था।

हालांकि बाद में नसबंदी और टीकाकरण की बात भी हुई, लेकिन नवंबर 2025 तक कोर्ट ने यह अनिवार्य कर दिया कि शैक्षणिक और स्वास्थ्य संस्थानों से कुत्तों को हटाकर उन्हें वापस वहां न छोड़ा जाए।

अब 2026 की शुरुआत में कोर्ट का रुख और भी कड़ा हो गया है, जो सीधे तौर पर इंसानी जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है।

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