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“भारत के नियम मंजूर नहीं तो देश छोड़ दें”, WhatsApp और Meta को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Supreme Court on WhatsApp: यूजर्स की प्राइवेसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी मेटा (Meta) और वॉट्सऐप (WhatsApp) को कड़ी चेतावनी दी है।

कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा है कि भारत में व्यापार करना है तो यहां के संविधान और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करना होगा, वरना कंपनी भारत छोड़कर जा सकती है।

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क्या है पूरा विवाद?

इस पूरे मामले की जड़ साल 2021 में शुरू हुई वॉट्सऐप की ‘प्राइवेसी पॉलिसी’ है।

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने जांच में पाया था कि वॉट्सऐप अपनी नई नीति के जरिए यूजर्स पर दबाव बना रहा है कि वे अपना डेटा फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी अन्य मेटा कंपनियों के साथ शेयर करें।

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CCI ने इसे बाजार में अपनी मजबूती का गलत फायदा (Abuse of Dominant Position) माना और कंपनी पर 213.14 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगा दिया।

इसी जुर्माने और CCI के आदेश के खिलाफ मेटा और वॉट्सऐप ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां उन्हें राहत मिलने के बजाय कड़ी फटकार का सामना करना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियां

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जयमाला बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।

कोर्ट के रुख से साफ था कि वह कंपनियों की ‘डेटा शेयरिंग’ की जिद से खुश नहीं है।

1. “भारत छोड़ दो” की चेतावनी: सुनवाई के दौरान जब डेटा प्राइवेसी और भारतीय नियमों के पालन की बात आई, तो बेंच ने स्पष्ट कहा कि अगर मेटा को भारत के नियम और यहाँ के नागरिकों की प्राइवेसी मंजूर नहीं है, तो उन्हें देश में रहने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी कंपनी को लोगों के अधिकारों की कीमत पर मुनाफा कमाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

2. चालाकी भरी शर्तें और भ्रमित यूजर: CJI सूर्यकांत ने वॉट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ये कंपनियां अपनी शर्तें इतनी कानूनी बारीकियों और चालाकी से लिखती हैं कि एक आम आदमी, जैसे कोई रेहड़ी-पटरी वाला या कम पढ़ा-लिखा बुजुर्ग, इसे समझ ही नहीं सकता। कोर्ट ने इसे ‘भ्रामक’ बताया और कहा कि डेटा चोरी करने का यह तरीका बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

3. लिखित हलफनामे की मांग: अदालत ने मेटा से केवल मौखिक आश्वासन नहीं, बल्कि एक लिखित हलफनामा (Affidavit) मांगा है। इस हलफनामे में कंपनी को यह साफ-साफ लिखना होगा कि वे किसी भी भारतीय यूजर का डेटा साझा नहीं करेंगे। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर यह हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो मेटा की याचिका को तुरंत खारिज कर दिया जाएगा।

‘मानो या छोड़ो’ वाली नीति पर प्रहार

CCI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि वॉट्सऐप ने यूजर्स के सामने ‘Take it or Leave it’ (मानो या छोड़ो) की स्थिति पैदा कर दी थी।

यूजर्स के पास डेटा शेयरिंग से मना करने (Opt-out) का कोई विकल्प नहीं था।

अगर यूजर को ऐप इस्तेमाल करना है, तो उसे शर्तें माननी ही होंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्रतिस्पर्धा नियमों और निजता के अधिकार का उल्लंघन माना है।

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आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई और जुर्माने पर अंतरिम आदेश के लिए 9 फरवरी की तारीख तय की है।

कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भारत में निजता का अधिकार (Right to Privacy) एक मौलिक अधिकार है और इसे तकनीकी दिग्गज कंपनियों की ‘मर्जी’ पर नहीं छोड़ा जा सकता।

इस फैसले का असर न केवल वॉट्सऐप पर, बल्कि भारत में काम कर रही तमाम विदेशी टेक कंपनियों पर पड़ेगा।

संदेश साफ है कि भारतीय बाजार बड़ा है, लेकिन यहां के नागरिकों का डेटा और सुरक्षा उससे भी बड़ी है।

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