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तमिलनाडु में ऐतिहासिक बदलाव: BJP-DMK से AIADMK तक, किसी भी बड़े दल ने ब्राह्मण उम्मीदवार को नहीं दिया टिकट

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Tamil Nadu Election Brahmin Candidates: तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से अपनी अनूठी पहचान और विचारधारा के लिए जानी जाती रही है।

‘पेरियार’ के आत्म-सम्मान आंदोलन और ब्राह्मण विरोधी द्रविड़ राजनीति की नींव पर खड़े इस राज्य में आज एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है।

2026 के विधानसभा चुनावों के लिए जब राज्य के बड़े दलों ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की, तो एक कड़वी हकीकत सामने आई।

राज्य के चारों प्रमुख दलों (DMK, AIADMK, कांग्रेस और BJP) ने एक भी ब्राह्मण चेहरे को चुनावी मैदान में नहीं उतारा है।

 

35 साल पुरानी परंपरा का अंत

यह बदलाव रातों-रात नहीं हुआ, लेकिन इसका असर बहुत गहरा है।

पिछले 35 सालों के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका है जब AIADMK (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) की सूची से ब्राह्मण नाम पूरी तरह नदारद हैं।

यह वही पार्टी है जिसकी कमान दशकों तक दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता के हाथों में थी, जो स्वयं ब्राह्मण समुदाय से आती थीं।

जयललिता के दौर में पार्टी ने हमेशा संतुलन बनाए रखा। 1980 के दशक में डॉ. एचवी हांडे पार्टी के बड़े ब्राह्मण चेहरे थे।

इसके बाद राम रामनाथन और आर. नटराज जैसे नेताओं को पार्टी ने लगातार मौके दिए।

लेकिन 2016 में जयललिता के निधन के बाद धीरे-धीरे समीकरण बदलने लगे।

2021 तक आते-आते यह प्रतिनिधित्व कम हुआ और अब 2026 में यह शून्य पर पहुंच गया है।

BJP का चौंकाने वाला फैसला

सबसे ज्यादा हैरानी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के फैसले पर हो रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर BJP को ब्राह्मणों और सवर्णों की हितैषी पार्टी माना जाता है।

तमिलनाडु में भी ‘ताम्ब्रास’ (तमिलनाडु ब्राह्मण एसोसिएशन) ने BJP को अपना खुला समर्थन दिया हुआ है।

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बावजूद इसके, पार्टी को मिली 27 सीटों में से एक पर भी किसी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया गया।

चर्चा थी कि पार्टी के वरिष्ठ नेता एच. राजा और केटी राघवन को मैदान में उतारा जाएगा।

एच. राजा अपनी प्रखर हिंदूवादी छवि के लिए जाने जाते हैं, लेकिन स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर उन्हें रेस से बाहर रखा गया। वहीं राघवन के नाम पर भी सहमति नहीं बन पाई।

यह स्थिति दर्शाती है कि BJP अब तमिलनाडु में अपनी ‘सवर्ण समर्थक’ छवि को बदलकर पिछड़ों और दलितों के बीच पैठ बनाने की ‘द्रविड़ियन स्टाइल’ राजनीति की ओर बढ़ रही है।

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DMK और कांग्रेस: विचारधारा की मजबूरी या चुनावी गणित?

DMK (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) हमेशा से ब्राह्मण विरोधी राजनीति की अगुवाई करती रही है, इसलिए उसके द्वारा टिकट न देना बहुत चौंकाने वाला नहीं है।

लेकिन कांग्रेस, जो कभी राज्य में सभी वर्गों को साथ लेकर चलती थी, उसने भी इस बार दूरी बना ली है।

जानकारों का मानना है कि गठबंधन की राजनीति में सीटें कम होने और जातीय समीकरण (जैसे वन्नियार, थेवर और गोंडर समुदायों का दबदबा) के चलते ब्राह्मणों का दावा कमजोर पड़ गया है।

नए खिलाड़ी: विजय और सीमान का मास्टरस्ट्रोक

जहाँ पुराने धुरंधरों ने ब्राह्मणों से किनारा किया, वहीं राज्य की राजनीति में उभरे नए चेहरों ने अलग रास्ता चुना है।

सुपरस्टार थलपति विजय की नई पार्टी TVK (तमिलगा वेट्टी कझगम) ने दो ब्राह्मणों को टिकट देकर सबको चौंका दिया है।

वहीं, कट्टर तमिल राष्ट्रवादी विचारधारा रखने वाले सीमान की पार्टी NTK (नाम तमिलर काची) ने तो छह ब्राह्मण उम्मीदवारों को चुनावी जंग में उतारा है।

इन दोनों नेताओं ने चतुराई से मैलापोर और श्रीरंगम जैसी सीटों को चुना है।

ये वो इलाके हैं जहाँ ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है और वे चुनाव के परिणाम को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं।

विजय और सीमान की कोशिश उन मतदाताओं को अपने पाले में करने की है जो बड़े दलों द्वारा उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

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सामाजिक और संवैधानिक सवाल

यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के प्रतिनिधित्व वाले मॉडल पर सवालिया निशान लगाती है।

संविधान की धारा 14 और 15 समानता और बिना किसी भेदभाव के प्रतिनिधित्व की बात करती है।

जब मुख्यधारा के दल किसी एक वर्ग को पूरी तरह हाशिए पर धकेल देते हैं, तो क्या वह वर्ग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से खुद को कटा हुआ महसूस नहीं करेगा?

तमिलनाडु की कुल आबादी में ब्राह्मणों की संख्या भले ही 2 से 3 प्रतिशत हो, लेकिन शिक्षा, कला और प्रशासन में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा है।

अब राजनीति में उनकी अनुपस्थिति यह संकेत दे रही है कि आने वाले समय में तमिलनाडु की राजनीति पूरी तरह से ‘मंडल बनाम कमंडल’ के बजाय ‘द्रविड़ अस्मिता बनाम क्षेत्रीय जातीय पहचान’ के इर्द-गिर्द सिमट जाएगी।

2026 का चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

बड़े दलों का यह दांव क्या उन्हें सत्ता तक पहुंचाएगा या ब्राह्मणों की नाराजगी उन्हें भारी पड़ेगी, यह तो नतीजे ही बताएंगे।

लेकिन एक बात साफ है—तमिलनाडु में अब ‘ब्राह्मण चेहरा’ होना चुनावी राजनीति में फायदे का सौदा नहीं रहा।

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